NEET Aspirant Akanksha Suicide Note: मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां नीट की छात्रा ने आकांक्षा चतुर्वेदी ने खुदकुशी कर जान दे दी. डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली आकांक्षा की मौत के बाद से परिवार में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार ने बेटी को पढ़ाने के लिए कर्ज लिया था. इस घटना ने एक बार फिर देश की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था और छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए पिता ने लिया था कर्ज
मऊगंज जिले के मगनिया गांव निवासी आकांक्षा के पिता कृष्ण कुमार चौबे किसान होने के साथ नागपुर में कुक का काम भी करते थे. आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों को पंख देने में कोई कसर नहीं छोड़ी पिता ने किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) से लगभग 3 लाख रुपये का ऋण लिया, रिश्तेदारों से उधार लिया और हर संभव त्याग करके बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाया. परिवार को विश्वास था कि इस बार उनकी बेटी डॉक्टर बनकर घर का नाम रोशन करेगी.
परीक्षा के बाद खुश थी आकांक्षा
परिजनों के अनुसार NEET परीक्षा देने के बाद आकांक्षा बेहद खुश थी. उसे भरोसा था कि इस बार उसका चयन हो जाएगा, लेकिन परीक्षा से जुड़ी कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक और दोबारा परीक्षा की चर्चाओं ने उसके मन में डर और असुरक्षा पैदा कर दी. धीरे-धीरे वह तनाव में रहने लगी. भविष्य को लेकर चिंतित रहने वाली आकांक्षा अवसाद में चली गई और आखिरकार 20 मई 2026 को अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.
सुसाइड नोट में लिखी दिलदहला देने वाली बातें
आकांक्षा द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है. उसने अपने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा कि उसमें दोबारा NEET परीक्षा देने की ताकत नहीं बची है. उसने लिखा कि उसे पहली परीक्षा में अच्छे अंक आने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन अगर परीक्षा दोबारा हुई तो वह वैसा प्रदर्शन कर पाएगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है. यह डर और मानसिक दबाव उसे अंदर ही अंदर तोड़ता चला गया.
दुख की घड़ी में परिवार के साथ खड़ी हुई कांग्रेस
आकांक्षा की मौत के बाद कांग्रेस नेताओं ने उसके परिजनों से मुलाकात की और शोक संवेदनाएं व्यक्त की. इस दौरान कांग्रेस की ओर से परिवार को 3 लाख 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी सौंपी गई. नेताओं ने कहा कि यह सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें लाखों छात्र अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
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आकांक्षा चली गई, लेकिन छोड़ गई कई सवाल
आकांक्षा की मौत ने एक बार फिर देश की प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर बहस छेड़ दी है. आज आकांक्षा इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसका अधूरा सपना, पिता का कर्ज, मां की सूनी आंखें और सुसाइड नोट में लिखे शब्द व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं.
