Damoh News: मध्य प्रदेश पुलिस विभाग पर यह कहावत एक बार फिर सटीक बैठती नजर आ रही है. “देर से ही सही, लेकिन जाग तो गए…” लेकिन सवाल यह है कि जब पुलिस जागी, तब तक कहीं बहुत देर तो नहीं हो चुकी थी.?
मामला दमोह जिले के तेंदूखेड़ा में कथित फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी लाभ लेने का है, जहां पुलिस ने आखिरकार कार्रवाई करते हुए 02 सितंबर 2026 को अपराध क्रमांक 0346 दर्ज कर लिया. लेकिन FIR दर्ज होने के बाद आरोपी करन उपाध्याय के फरार होने की बात सामने आ रही है. ऐसे में पुलिस की कार्रवाई के साथ-साथ हुई देरी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
शिकायत से FIR तक… पूरे 365 दिन
मामले की शुरुआत 08 सितंबर 2025 को हुई, जब कलेक्ट्रेट में तत्कालीन कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर के समक्ष कथित फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर शिकायत दी गई थी. शिकायत के बाद मामला अस्पताल विभाग सहित अलग-अलग स्तरों की जांच प्रक्रिया में पहुंचा. संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई.
इसके बाद सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक, दमोह की जांच रिपोर्ट क्रमांक अ.प्र./2026/2646, दिनांक 06 मार्च 2026 में साफ हो गया कि करन उपाध्याय के नाम से स्थायी दिव्यांगता का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है और संबंधित दस्तावेज सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं मिले.
जांच रिपोर्ट आई, फिर भी FIR क्यों नहीं
यहीं से पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा होता है. जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद नगर परिषद सीएमओ, तेंदूखेड़ा ने थाना प्रभारी को एक नहीं, बल्कि दो बार पत्र लिखकर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ अपराध दर्ज करने का अनुरोध किया. इसके बावजूद FIR दर्ज होने में लंबा वक्त लग गया. सवाल यही है कि जब संबंधित विभागों की जांच प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और नगर परिषद की ओर से पुलिस को पत्र भी भेजे जा चुके थे, तो पुलिस को कार्रवाई करने में इतना विलंब क्यों लगा?
सवाल पूछे गए, जवाब मिलता रहा
इस दौरान जब भी यह सवाल उठाया गया कि आरोपी के खिलाफ आखिर कायमी कब होगी, तो मामले की जांच और प्रक्रिया का हवाला दिया जाता रहा. लेकिन FIR दर्ज होने की तारीख लगातार आगे बढ़ती रही. आखिरकार 08 सितंबर 2025 की शिकायत के करीब एक साल बाद, 02 सितंबर 2026 को तेंदूखेड़ा पुलिस ने अपराध क्रमांक 0346 दर्ज किया. यानी एक FIR तक पहुंचने में करीब 365 दिन का वक्त लग गया.
आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर हो गया
अब इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस कार्रवाई के लिए पुलिस को पूरा एक साल लगा, उसी दौरान आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर कैसे हो गया.? आरोप है कि संबंधित व्यक्ति ने नगर परिषद से करीब तीन साल तक पेंशन का लाभ लिया, और जब खुलासा हुआ तो खुद ही नगर परिषद पहुंचकर आवेदन के जरिए पेंशन बंद करा दी. यदि जांच में सामने आए तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर मामला सही पाया जाता है, तो सरकारी राशि के उपयोग और उसकी वसूली का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
अब सवाल सिर्फ FIR का नहीं
मामला अब सिर्फ अपराध दर्ज होने तक सीमित नहीं है. असली सवाल पुलिस की कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर है. जब शिकायत 2025 में हुई, जांच रिपोर्ट 2026 में सामने आ गई, नगर परिषद ने पुलिस को दो बार पत्र लिख दिया, तो FIR के लिए आखिर इतना लंबा इंतजार क्यों…?
क्या समय रहते कार्रवाई होती तो आरोपी आज फरार होता?
अब पुलिस के सामने आरोपी को पकड़ने के साथ-साथ इस पूरे मामले में हुई देरी की वजह स्पष्ट करने की चुनौती भी है. साथ ही कथित फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर लिए गए सरकारी लाभ और राशि की भी जांच महत्वपूर्ण होगी.
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