इस मिठाई की सबसे अनोखी बात यह है कि इसे रोजाना सिर्फ 5 किलो ही बनाया जाता है. शाम 5 बजे दुकान सजती है और महज 60 मिनट के भीतर दोनों बड़ी परातें पूरी तरह खाली हो जाती हैं. जो देर से पहुंचा, उसे अगले दिन का इंतजार करना पड़ता है. सन 1964 में भैरव सरदार द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी उसी शुद्धता के साथ जारी है. इस मिठाई में दूध, गाढ़ी मलाई, केसर, इलायची, काजू-बादाम के साथ-साथ जायफल और जावित्री जैसी पारंपरिक जड़ी-बूटियों का मिश्रण किया जाता है इसे तैयार करने में पूरे 12 घंटे की कड़ी मेहनत लगती है. यह कोई आम मिठाई नहीं है. 1500 से 2000 प्रति किलो बिकने वाली यह मलाई पाक सिर्फ ठंड के 3-4 महीनों में ही बनाई जाती है. केसर, मलाई और मेवों से भरपूर होने के कारण यह शरीर को जबरदस्त ताकत देती है. हालांकि, इसकी बेहिसाब मिठास और भारीपन के कारण कम पाचन शक्ति वाले लोग इसे संभलकर ही खाते हैं. भले ही मांग बहुत ज्यादा हो, लेकिन स्वाद और शुद्धता से समझौता न करने की जिद के कारण यह आज भी रोज केवल 5 किलो ही बनती है. बनारस की 60 साल पुरानी ‘पलंगतोड़’ का अनोखा क्रेज वहां पहुंचने वाले पर्यटकों पर भी देखा जाता है.