Diwali Diya Religious Significance: हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस साल दीवाली का पावन पर्व 8 नवंबर को मनाया जाएगा. दीपावली को लेकर अभी से ही लोगों में जश्न का माहौल देखने को मिल रहा है. मार्केट में दिए, पटाखे, रंगोली और दिवाली से जुड़ा सामान बिकना भी शुरू हो गई है. सदियों से हम दीवाली के त्योहार पर मिट्टी के दीपक जलाते चले आ रहे हैं. सनातन परंपरा में दीपक को शुभता, ज्ञान और आशा का प्रतीक माना जाता है.
लेकिन मिट्टी के दीयों का महत्व सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. इनके पीछे हमारी संस्कृति, कारीगरी और सामाजिक जीवन से जुड़े कई खूबसूरत पहलू भी हैं. आइए जानते हैं इस बारे में कि आखिर दीवाली पर मिट्टी के दिए क्यों जलाते हैं.
प्राचीन लोककला और परंपरा से जुड़े हैं मिट्टी के दीये
मिट्टी के दीये सिर्फ रोशनी का साधन नहीं हैं, बल्कि यह भारत की सदियों पुरानी लोककला का हिस्सा हैं. देश के कुम्हार समुदाय के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने हाथों से मिट्टी को आकार देकर सुंदर दीये बनाते आ रहे हैं. उनके बनाए हुए ये दीये हर साल दिवाली पर हमारी घरों को रोशन करते हैं.
निराशा पर आशा की जीत का प्रतीक है दीया
सनातन संस्कृति में दीया जलाना अंधेरे पर उजाले की जीत माना जाता है. दिवाली की रात जब हम दीया जलाते हैं तो यह हमें सिखाता है कि जीवन में चहे कितना भी अंधेरा हो, ज्ञान और उम्मीद की रोशनी हमेशा बनी रहती है.
कुम्हारों के घर में भी खुशियां लाते हैं मिट्टी के दीये
जब हम बाजार से मिट्टी के दीये खरीदते हैं तो इसका सीधा फायदा स्थानीय कुम्हारों को मिलता है. इससे उनकी मेहनत को सम्मान मिलत है और उनके परिवार की आजीविका चलती है.
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पर्यावरण की दृष्टि से कितने सही हैं मिट्टी के दीये
मिट्टी के दीये पूरी तरह से प्राकृतिक मिट्टी से बनाए जाते हैं, जो इस्तेमाल के बाद टूटकर फिर से मिट्टी में मिल जाते हैं और इससे कचरा नहीं फैलता. हालांकि जब इन दीयों में तेल या घी जलाया जाता है तो थोड़ा धुआं और कालापन जरूर निकलता है.
