CG News: 160 करोड़ के मध्यस्थता अवॉर्ड की वसूली का मामला, हाईकोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत अधिकारियों पर नहीं डाली जा सकती भुगतान की जिम्मेदारी
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CG News: बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवॉर्ड की राशि की वसूली से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि निष्पादन न्यायालय किसी विभागीय अधिकारी पर व्यक्तिगत वित्तीय देनदारी नहीं डाल सकता. हाईकोर्ट ने उन निर्देशों को निरस्त कर दिया, जिनके तहत लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों से व्यक्तिगत शपथपत्र व अंडरटेकिंग मांगी गई थी और अवॉर्ड की राशि का भुगतान नहीं होने पर उनके खिलाफ व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने तथा अवमानना कार्रवाई की बात कही गई थी. हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्यस्थता अवॉर्ड की वसूली की कार्रवाई कानून के अनुसार जारी रहेगी.
मामला बस्तर जिले में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र की योजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग-63 के विभिन्न हिस्सों में दो लेन सड़क निर्माण से जुड़ा है. केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इस परियोजना के लिए पहले 169.23 करोड़ रुपए की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 211.53 करोड़ रुपए किया गया. परियोजना की पूरी राशि केंद्र सरकार द्वारा दी गई थी, जबकि राज्य का लोक निर्माण विभाग कार्यान्वयन एजेंसी था. ठेकेदार को कार्य का ठेका मिलने के बाद निर्माण कार्य 30 जून 2019 को पूरा हुआ. इसके बाद ठेकेदार ने 190.33 करोड़ रुपए के अतिरिक्त दावे की मांग की, जिसे विभाग ने खारिज कर दिया.
2022 में अवार्ड पारित किया गया
दावे को लेकर ठेकेदार ने मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की. एकल मध्यस्थ की नियुक्ति के बाद राज्य की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि और कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं होने के बीच मध्यस्थ ने एकतरफा कार्यवाही करते हुए 2 सितंबर 2022 को 160 करोड़ 30 लाख 11 हजार 411 रुपए के भुगतान का अवॉर्ड पारित किया. इसके बाद ठेकेदार ने वाणिज्यिक न्यायालय में अवॉर्ड की वसूली के लिए निष्पादन प्रकरण दायर किया.
राज्य सरकार ने अवॉर्ड को चुनौती दी थी, लेकिन धारा 34 के तहत आवेदन समय-सीमा के कारण खारिज हो गया. इसके बाद धारा 37 के तहत की गई चुनौती भी हाईकोर्ट ने 10 जून 2024 को खारिज कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने भी 19 जनवरी 2026 को 484 दिन की देरी के आधार पर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी. इसके बाद अवॉर्ड की वसूली की कार्रवाई आगे बढ़ी.
निष्पादन न्यायालय ने भुगतान में देरी को लेकर लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे. 30 अप्रैल 2026 के आदेश में इंजीनियर-इन-चीफ और संबंधित मुख्य अभियंता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर भुगतान की दिशा में किए गए प्रयास और संभावित समयसीमा बताने को कहा गया था. साथ ही विभाग से बैंक खातों, परियोजना खातों, प्राप्त राशि, शेष राशि और अन्य वित्तीय विवरण भी मांगे गए थे.
22 जून 2026 के आदेश में निष्पादन न्यायालय ने सचिव, लोक निर्माण विभाग, इंजीनियर-इन-चीफ और मुख्य अभियंता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने को कहा था कि अवॉर्ड की राशि का भुगतान कैसे और कितनी जल्दी किया जाएगा. साथ ही मामले को अवमानना कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट भेजने की संभावना भी जताई गई थी.
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि मध्यस्थता अवॉर्ड अंतिम रूप ले चुका है और उसकी वसूली कानून के अनुसार की जा सकती है. लेकिन मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 के तहत अवॉर्ड की वसूली उसी तरह की जानी है, जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत किसी डिक्री की जाती है. निष्पादन न्यायालय कानून में निर्धारित प्रक्रिया से बाहर जाकर व्यक्तिगत अधिकारियों पर ऐसी देनदारी नहीं डाल सकता, जो मूल अवॉर्ड में उनके खिलाफ तय नहीं की गई है.
और क्या कहा हाईकोर्ट ने ?
कोर्ट ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत अधिकारियों से भुगतान का वादा करने वाले शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेना और भुगतान नहीं होने पर उन पर ब्याज की व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने की धमकी देना उचित नहीं है. यदि अवॉर्ड किसी राज्य विभाग या प्राधिकरण के खिलाफ है तो निष्पादन न्यायालय संबंधित सक्षम अधिकारी से विभाग की संपत्ति, धनराशि, स्वीकृति और भुगतान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांग सकता है तथा कानून में अनुमत वसूली के तरीके अपना सकता है.
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबित पुनर्विचार याचिका पर निष्पादन न्यायालय को उसकी सफलता या संभावना को लेकर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. हालांकि पुनर्विचार याचिका लंबित रहने मात्र से अवॉर्ड पर रोक नहीं लगती है.
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अधिकारियों से व्यक्तिगत शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेने, उन पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी डालने और केवल धनराशि का भुगतान नहीं होने के आधार पर अवमानना कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाने संबंधी निर्देशों को निरस्त कर दिया. साथ ही निष्पादन न्यायालय को अवॉर्ड की वसूली की कार्रवाई धारा 36 और आदेश 21 के तहत कानून के अनुरूप जारी रखने की अनुमति दी.
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