छत्तीसगढ़ की मीडिया टीम ने किया सिक्किम के नाथूला पास का दौरा, केंद्र सरकार के ‘रणभूमि’ प्रोजेक्ट को करीब से समझा

CG News: छत्तीसगढ़ मीडिया टीम ने सिक्किम दौरे के दौरान नाथूला पास विजिट किया. इस दौरान टीम ने इतिहास और केंद्र सरकार के 'रणभूमि' प्रोजेक्ट को करीब से समझा.
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सिक्किम दौरे पर छत्तीसगढ़ मीडिया टीम

CG News: छत्तीसगढ़ से मीडिया सदस्यों की टीम इन दिनों सिक्किम दौरे पर पहुंची है. 7 दिनों के अध्ययन प्रवास के दौरान सभी सदस्यों को सिक्किम में केंद्र सरकार द्वारा संचालित महत्वाकांक्षी परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे के विकास और सामरिक महत्व के कार्यों की जानकारी दी जा रही है. इस कड़ी में मीडिया टीम ने सिक्किम के नाथूला पास का दौरा कर सीमावर्ती क्षेत्र की स्थिति, इतिहास और केंद्र सरकार के ‘रणभूमि’ प्रोजेक्ट को करीब से समझा. PIB रायपुर द्वारा आयोजित इस यात्रा का उद्देश्य पत्रकारों को सीमा पर तैनात जवानों के जीवन और उनकी चुनौतियों से रूबरू कराना था.

क्या है ‘रणभूमि’ प्रोजेक्ट?

-‘रणभूमि’ प्रोजेक्ट के तहत सरकार बॉर्डर एरिया में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहती है.

  • इस योजना का मकसद सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता दिखाना नहीं, बल्कि लोगों को यह भी बताना है कि इन सीमाओं की रक्षा में जवान कितनी मेहनत और बलिदान करते हैं.
  • इस प्रोजेक्ट से आने वाले समय में सिक्किम में पर्यटन को नया बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
  • नाथू ला पास का ऐतिहासिक महत्व भी काफी बड़ा है.
  • यह कभी भारत, तिब्बत और चीन के बीच व्यापार का मुख्य रास्ता था, जिसे सिल्क रूट कहा जाता था.
  • यहां से दोनों देशों के बीच सामान का आदान-प्रदान होता था.

इस दौरे के दौरान जाट रेजिमेंट के कैप्टन देव शर्मा ने 1967 के युद्ध के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि उस समय भारतीय सेना वहां बाड़ लगा रही थी, तभी चीन ने अचानक हमला कर दिया. इस हमले में भारत के कई जवान शहीद हुए, लेकिन भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई में चीन को करारा जवाब दिया और लगभग 400 चीनी सैनिक मारे गए. इस जीत के बाद इस क्षेत्र में भारत की मजबूत पकड़ बनी रही.

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पत्रकारों को यह भी बताया गया कि भारत और चीन के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए साल में 8 बार ‘बॉर्डर पर्सनल मीटिंग’ होती है. भारत इनमें से 5 बैठकों की मेजबानी करता है, जबकि चीन 3 बैठकों की मेजबानी करता है. इन बैठकों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनाव को कम करना होता है. इस यात्रा में पत्रकारों ने जवानों की कठिन जिंदगी को भी करीब से देखा. यहां बहुत ज्यादा ठंड होती है और ऑक्सीजन भी कम होती है, जिससे सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है. जवान कम खाना खाते हैं और कई महीनों तक ऐसे ही हालात में ड्यूटी करते हैं.

जवानों ने यह भी बताया कि जब वे छुट्टी पर घर जाते हैं, तब भी उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कई बार उन्हें अपने निजी कामों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं और समाज में भी उन्हें हमेशा उतना सम्मान नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए. यह दौरा पत्रकारों के लिए एक खास अनुभव रहा. इससे उन्हें यह समझने का मौका मिला कि देश की सुरक्षा के लिए जवान कितनी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं. ‘रणभूमि’ प्रोजेक्ट के जरिए अब आम लोग भी इन बातों को करीब से जान पाएंगे और जवानों के बलिदान को समझ सकेंगे.

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