Khairagarh: 500 साल पुराना मां नर्मदा का उदग्म कुंड, जहां सालभर रहता है जल, आज से तीन दिवसीय मेले का होगा आयोजन
नर्मदा मेला महोत्सव का आयोजन
नितिन भांडेकर (खैरागढ़)
Khairagarh: खैरागढ़ जिले के नर्मदा में आज से तीन दिवसीय ऐतिहासिक नर्मदा मेला महोत्सव का शुभारंभ हो गया है. तीन दिवसीय मेला महोत्सव को लेकर लगभग सभी तैयारी पुरी कर ली गई है. यहां हजारों दर्शनार्थीयों की उमड़ने वाली भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए जिला पुलिस नें पुख्ता पुख्ता इंतजाम किया गया है.
नर्मदा कुण्ड़ में स्नान, माता रानी का दर्शन तथा मेला स्थल पर मंदिर समिति के सदस्य एवं पुलिस के जवान भीड़ को व्यवस्थित करने तैनात रहेंगे. महोत्सव का शुभारंभ नर्मदा मैय्या एवं कुण्ड़ की महाआरती के बाद किया जायेगा.
500 साल पुराना मां नर्मदा का उद्गम कुंड
- केसीजी जिला के खैरागढ़ नगर से लगभग 30 किमी. दूर नर्मदा स्थित है. इस अंचल का प्रसिध्द मेला और स्थानीय लोगों की आस्था और श्रध्दा का केन्द्र बिन्दु है.
- नर्मदा की प्रसिध्दि नर्मदा कुण्ड से है. जहां से गर्म जल की अजस्र धारा अनवरत प्रवाहित होती है. ऐसी धारा जो कभी छिजने का नाम नहीं लेती. चाहे, कितनी भी गर्मी क्यों न हो.
- बारह माह निरंतर वेग से प्रवाहित होती है. यहां आकर हजारों लोग पवित्र स्नान करते हैं और अपने को पुण्य का भागी बनाते हैं. लेकिन बीते कुछ वर्षो से जल की धाराएं थमने लगी है. नर्मदा कुण्ड ग्राम खैरा के पास स्थित है.
- कुण्ड की प्रसिध्दि के कारण एक और बस्ती बस गई है जिसे नर्मदा कहा जाता है. नर्मदा धार्मिक आस्थाओं का संगम स्थल ही नहीं बल्कि आवागमन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.
- यहां से राजनांदगांव, डोंगरगढ़, बालाघाट, भोपाल, कवर्धा, जबलपुर और बिलासपुर के लिये सड़क साधन उपलब्ध है. नर्मदा कुण्ड के किनारे नर्मदा देवी का प्रसिध्द मंदिर है.
- शक्ति स्वरुपा और जीवन दायिनी नर्मदा देवी में चैत्र और कुंवार महीने में जंवारा बोया जाता है. जहाँ श्रध्दालु भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण करने तेल और घृत की ज्योति जलाते हैं. इसी समय डोंगरगढ का प्रसिध्द मेला भी होता है.
- नर्मदा में नर्मदा मइया के अतिरिक्त राम मंदिर, कृष्ण मंदिर, लोधेश्वर (शिव) मंदिर, कबीर, कुटीर व बाबा गुरुघासी दास का जैतखाम दर्शनीय है.
कल्चुरि कालीन प्रतिमाएं भी स्थापित
लोगों का कहना है कि नर्मदा का मंदिर लगभग तीन-चार सौ साल पुराना है. किन्तु यहां रखी प्रस्तर प्रतिमाएँ कल्चुरि कालीन 10वीं-11वीं ई. की है. इन मूर्तियों का शिल्प वैभव बड़ा सुन्दर और कलात्मक है. इनमें प्रमुख गणेश, वीरभ्रद, देवी नर्मदा, बैकुण्ठधाम आदि प्रमुख हैं. अलंकृत नंदी की प्रतिमा, शिव लिंग व जलहरी भी यहाँ स्थापित है. नर्मदा मंदिर के शिखर व जंघा भाग में मध्य कालिन कुछ मूर्तियाँ विद्यमान है. इनमें रावण, कच्छपावतार, मतस्यवतार, नर्सिंह अवतार का सुंदर अंकन है. अत: नर्मदा मंदिर का अपना पुरातात्विक महत्व भी है.नर्मदा का प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष माघ-पूर्णिमा को तीन दिनों तक भरता है. जहाँ लोग हजारों की संख्या में नर्मदा स्नान व नर्मदा मैया के दर्शन के लिए आते हैं. यह इस अंचल का सबसे बड़ा मेला है.
क्या है मां नर्मदा की कहानी?
वैसे तो मां नर्मदा कुंड के बारे में तरह-तरह की कहानियां है लेकिन असल में यहा एक कहानी प्रचलित है, कहा जाता है कि खैरागढ़ रियासत मे मां नर्मदा के परम भक्त एक साधु थे. जिन्हें रुककड़ बाबा के नाम से जानते हैं. वे अक्सर नर्मदा स्नान के लिए पैदल मंडला जाया करते थे. पर्व विशेष में तो उनकी उपस्थिति मंडला में अनिवार्य होती थी. साधु की इस भक्ति से नर्मदा बड़ी प्रभावित हुई. नर्मदा मइया ने साधु की भक्ति से प्रसन्न होकर कहा – ”बेटा तुमने मेरी बड़ी भक्ति की है. मैं तुम से प्रसन्न हूं. तुम इतनी दूर चलकर आते हो, तुम्हारी पीड़ा मुझसे देखी नही जाती. इसलिए मैं स्वत: तुम्हारे नगर में आकर प्रकट होऊंगी. साधु नर्मदा मइया की इस महती कृपा से गदगद हो गये और अपने स्थान पर आकर नर्मदा माँ के प्रकट होने की प्रतीक्षा करने लगे.
इधर नर्मदा मइया एक साधारण स्त्री का रुप धारण कर खैरागढ के लिए प्रस्थान हुई. दिनभर चलती, रात को विश्राम करती. फिर प्रात: अपने गन्तव्य को चल पड़ती. पहेट के समय एक राऊत (यादव) अपनी गायों को पछेला” ढीलकर वहाँ चरा रहा था. जहाँ वर्तमान में नर्मदा कुण्ड है. छ्त्तीसगढ में राऊत मुंदरहा (भिनसरे) अपनी गायें ढीलकर चराता है. इस चरवाही को पछेला कहा जाता हैं. इसी समय नर्मदा मइया यहां से गुजर रही थी. संयोगवश राऊत की एक गाय खेत में चरने लगी. उस गाय का नाम भी नर्मदा था. राऊत ने कहा- “ये नर्मदा कहाँ जाबे ”अपना नाम सुनकर नर्मदा मइया ठिठक गई. उसने राऊत से पूछा-“भईया यह कौन सा गाँव है. राऊत ने कहा,खैरा. खैरा नाम सुनकर नर्मदा मैया ने सोचा, शायद यही तो उसका गंतव्य है. खैरा सुनकर नर्मदा मैया उसी स्थान पर ठहर कर जलधारा के रुप में धरती से फ़ूट पड़ी. खैरा और खैरागढ़ में गढ़ को छोड़ दें तो प्रथमत : खैरा ही है. कहा जाता है कि खैरागढ़ का नामकरण भी खैर वृक्षों की अधिकता के कारण ही हुआ है.
तब से नर्मदा मैया यहां मूर्ति के रुप में स्थापित है एवं गर्म जलधारा के रुप में प्रवाहित है. चूंकि नर्मदा की जलधारा का प्रवाह-स्थान गंडई जमींदारी में है, अत: तत्कालीन गंडई जमींदार ने उक्त स्थान पर भव्य मंदिर एवं कुण्ड का निर्माण कराया. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान नर्मदा कुण्ड से दस कदम दक्षिण में एक नाला है, जो तत्कालीन छुईखदान रियासत की सीमा रेखा है. नर्मदा मैया खैरागढ़ तो नहीं जा पाई फ़िर भी माँ की इस कृपा से साधू एवं खैरागढ़ नरेश अतिआनंदित हुये. नर्मदा कुण्ड से खैरागढ़ की दूरी 26 किलोमीटर है.