Surguja: वेटनरी मोबाइल यूनिट संचालन के लिए अजीब नियम, हर साल 32 करोड़ खर्च लेकिन बेज़ुबानों को नहीं मिल रहा इलाज
बेजुबानों को नहीं मिल रहा इलाज
Surguja News: छत्तीसगढ़ में पशुपालन विभाग के द्वारा मवेशियों को तुरंत इलाज मिल सके इसके लिए वेटनरी एम्बुलेंस चलाई जा रही है. पूरे प्रदेश में 161 वेटनरी वैन संचालित किया जा रहे हैं, लेकिन इसका लाभ सीधे तौर पर पशुपालकों और बीमार पशुओं को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इसके लिए जो नियम तय किए गए हैं वह तुरंत लाभ दिलाने में आड़े आ रहे हैं. बीमार मवेशियों और परेशान पशु पालकों को दरकिनार कर बनाए गए इस नियम की वजह से बड़े स्तर पर दवाई खरीदी और एंबुलेंस के संचालन में गड़बड़ी की जा रही है.
दिखावे के लिए मोबाइल यूनिट में दवाइयां
विस्तार न्यूज ने इस पूरे मामले की पड़ताल की. पड़ताल के दौरान खुलासा हुआ है कि प्रदेश में ‘भव्या हेल्थ केयर’ नामक निजी कंपनी से अनुबंध कर वेटनरी एम्बुलेंस का संचालन प्रदेश में की जा रही है. इसके अनुसार 1 दिन में एक एंबुलेंस कुल 80 किलोमीटर चलेगी और तीन गांवों को कवर करेगी. वहीं महीने में 30 हजार रुपए की दवाइयां खर्च हो रही हैं, लेकिन सच्चाई तो ये है कि दिखावे के लिए ही पशु चिकित्सा मोबाइल यूनिट में दवाइयां रखी जाती हैं.
निजी डॉक्टरों से इलाज कराने पुशपालक मजबूर
दूसरी तरफ जब पशु पालक अपने मवेशी के बीमार होने पर टोल फ्री नंबर पर कॉल करते हैं और उन्हें बताया जाता है कि अभी एम्बुलेंस का रूट दूसरे इलाके में है. जब आपके इलाके के लिए तय रूट में एम्बुलेंस आएगी तो उस दिन मवेशी का इलाज करा सकते हैं. ऐसे में मवेशी पालक निजी सेक्टर के डॉक्टर से अपने मवेशियों का इलाज कराने मजबूर हैं, क्योंकि बीमार मवेशियों को छोड़कर एंबुलेंस के आने के दिन का इंतजार नहीं किया जा सकता. मवेशी पालकों का कहना है कि यह नियम बिल्कुल व्यावहारिक है. जब मवेशी बीमार पड़ा हुआ है तो वह कई-कई दिनों का इंतजार कैसे कर सकते हैं.
दूसरी तरफ निर्धारित रूट पर चलने वाली इन एंबुलेंस में पर्याप्त मात्रा में दवाइयां भी नहीं रहती हैं. सिर्फ दिखावे के लिए कुछ दवाइयां रखी जा रही हैं, जिसकी वजह से मवेशियों का इलाज नहीं हो पा रहा है. हर महीने करोड़ों रुपए का भुगतान एंबुलेंस संचालन के नाम पर अधिकारियों के द्वारा किया जा रहा है.
हर महीने 32 करोड़ रुपए खर्च
सरगुजा जिले में ही साथ वेटनरी वैन संचालित किया जा रहे हैं, लेकिन जब लोग टोल फ्री नंबर 1962 पर कॉल किया जाता है तो बताया जाता है कि वैन अभी दूसरे रूट पर है. वेटरनरी वैन में अनुबंध के मुताबिक हमेशा एक वेटनरी डॉक्टर, एक सहयोगी कर्मचारी और ड्राइवर को मौजूद रहना है, जिनके वेतन में ही करीब 90 हजार रुपए हर महीने खर्च हो रहे हैं. सरकार द्वारा एक पशु चिकित्सा मोबाइल यूनिट को चलाने के लिए हर महीने करीब 1,70,000 रुपए खर्च हो रहे हैं और अगर पूरे प्रदेश के 161 पशु चिकित्सा मोबाइल यूनिट पर हर साल आने वाले खर्च की बात करें तो करीब 32 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है, लेकिन इतने रुपए खर्च होने के बावजूद अव्यवहारिक नियम की वजह से पशुपालकों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.
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पशुपालन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि मोबाइल यूनिट के लिए रूट चार्ट वाला नियम समझ से परे है क्योंकि अगर किसी बीमार मवेशी का मोबाइल यूनिट के द्वारा जाकर इलाज किया जाता है और उसके बाद उसे दूसरे दिन भी इंजेक्शन और दूसरे ट्रीटमेंट की जरूरत डॉक्टर के माध्यम से है तो फिर अगले दिन रूट बदल जाने की वजह से उसका इलाज प्रॉपर तरीके से नहीं हो पाता है.
सरगुजा जिले के पशुपालन विभाग के डॉक्टर और पशु चिकित्सा मोबाइल यूनिट के नोडल अधिकारी अरुण सिंह का कहना है कि यह नियम सरकार के द्वारा ही कंपनी से अनुबंध के दौरान बनाया गया है. उन्होंने भी बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि यह नियम और व्यावहारिक है लेकिन सरकार और विभाग के उच्च अफसरो को ही इस पर संशोधन या कार्यवाही का अधिकार है.