मुस्लिम कानून के तहत Hiba में कब्जे की सुपुर्दगी जरूरी, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने खारिज की अपील

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के हिबा (उपहार) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने 10 अगस्त को फैसला सुनाते हुए रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश द्वारा दिए गए निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा तथा संपत्ति विवाद में दायर प्रथम अपील खारिज कर दी।
CG High Court (File Photo)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के Hiba (उपहार) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल उपहार विलेख का पंजीयन हो जाने से हिबा वैध नहीं हो जाता। वैध हिबा के लिए दानकर्ता की घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति और संपत्ति के कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी आवश्यक है। अदालत ने कहा कि यदि पूरी संपत्ति का कब्जा वास्तव में हस्तांतरित नहीं हुआ है, तो केवल दस्तावेज में कब्जा देने का उल्लेख पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रायपुर के खनिज नगर, पुरैना तेलीबांधा स्थित 1500 वर्गफीट की संपत्ति से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने 10 अगस्त को फैसला सुनाते हुए रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश द्वारा दिए गए निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा तथा संपत्ति विवाद में दायर प्रथम अपील खारिज कर दी।

2019 में किया गया था उपहार विलेख

मामले के अनुसार, विवादित संपत्ति प्लॉट नंबर 46 है, जिसका क्षेत्रफल 1500 वर्गफीट है। प्रतिवादियों की ओर से दावा किया गया था कि संपत्ति के मालिक ने 27 मार्च 2019 को चार लोगों के पक्ष में पंजीकृत उपहार विलेख कर दिया था। इसके बाद उपहार प्राप्तकर्ताओं के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए। वहीं वादी पक्ष का कहना था कि दिवंगत नौशाद अली ने संपत्ति की खरीद और निर्माण में रकम लगाई थी। उन्होंने संपत्ति के एक हिस्से में करीब 370 वर्गफीट का मकान बनवाया था, जिसमें उनकी पत्नी और बच्चे लंबे समय से रह रहे थे। उपहार विलेख के बाद उन्हें वहां से हटाने का प्रयास किया गया।

कब्जा नहीं सौंपा गया, इसलिए हिबा अधूरा

हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत हिबा के तीन आवश्यक तत्वों पर विशेष जोर दिया। अदालत के अनुसार दानकर्ता द्वारा उपहार की घोषणा, प्राप्तकर्ता द्वारा उसकी स्वीकृति और उपहार की गई संपत्ति के कब्जे की सुपुर्दगी-तीनों आवश्यक हैं। केवल उपहार विलेख तैयार या पंजीकृत कर देने से वैध Hiba साबित नहीं होता। अदालत ने पाया कि उपहार विलेख में कब्जा सौंपने का उल्लेख होने के बावजूद वादी पक्ष संपत्ति के करीब 370 वर्गफीट हिस्से पर लगातार काबिज था। प्रतिवादी यह साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सके कि पूरी संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा उपहार प्राप्तकर्ताओं को सौंप दिया गया था।

चार लोगों को संयुक्त रूप से दी गई थी संपत्ति

अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि उपहार विलेख चार लोगों के पक्ष में संयुक्त रूप से किया गया था, लेकिन उसमें प्रत्येक व्यक्ति का हिस्सा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं था। संपत्ति का एक हिस्सा पहले से वादी पक्ष के कब्जे में था। ऐसे में अदालत ने मुस्लिम कानून में लागू ‘मुशा’ के सिद्धांत को भी प्रासंगिक माना। हालांकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुशा के सिद्धांत को हर मामले में यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। इस मामले में उपहार की वैधता पर सवाल केवल मुशा के आधार पर नहीं, बल्कि कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं होने और वादी पक्ष के लगातार कब्जे सहित सभी परिस्थितियों को मिलाकर तय किया गया।

कब्जे में रह रहे लोगों को जबरन नहीं हटाया जा सकता

बिलासपुर हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से संपत्ति पर शांतिपूर्ण कब्जे में रहने वाले व्यक्ति को केवल किसी विवादित दस्तावेज के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। यदि किसी पक्ष का संपत्ति पर बेहतर अधिकार होने का दावा है, तो उसे कानून के अनुसार उचित राहत हासिल करनी होगी। अदालत ने माना कि वादी पक्ष लंबे समय से संपत्ति के एक हिस्से में रह रहा था और उसके कब्जे में हस्तक्षेप किए जाने की आशंका थी। इसलिए स्थायी निषेधाज्ञा के जरिए उनके कब्जे की सुरक्षा करना उचित था।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रखा बरकरार

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि 27 मार्च 2019 का पंजीकृत उपहार विलेख मुस्लिम कानून के तहत हिबा की सभी आवश्यक शर्तों के अनुसार पूरा हुआ था। खास तौर पर पूरी संपत्ति के कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं हुई। अदालत ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश के 24 नवंबर 2025 के फैसले और 27 नवंबर 2025 की डिक्री में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए प्रथम अपील खारिज कर दी। निचली अदालत द्वारा उपहार विलेख को वादी पक्ष के लिए शून्य और बाध्यकारी नहीं मानने तथा उनके कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक लगाने का आदेश बरकरार रखा गया।

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