Raipur: दुर्लभ बीमारी से जूझ रही 14 साल की बच्ची की त्वचा में सुधार, 55 दिन के इलाज का दिखा असर

Raipur: दंतेवाड़ा के घने जंगलों से लगे गांव की 14 वर्षीय जोगेश्वर कड़की की दुर्लभ त्वचा बीमारी के इलाज में अब उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है. करीब 55 दिनों के उपचार के बाद बच्ची की त्वचा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.
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दुर्लभ बीमारी से जूझ रही 14 साल की बच्ची की त्वचा में सुधार

Raipur: दंतेवाड़ा के घने जंगलों से लगे गांव की 14 वर्षीय जोगेश्वर कड़की की दुर्लभ त्वचा बीमारी के इलाज में अब उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है. करीब 55 दिनों के उपचार के बाद बच्ची की त्वचा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. बीमारी के कारण उसके चेहरे को छोड़कर पूरे शरीर की त्वचा पत्थर और पेड़ की छाल जैसी सूखकर मोटी, खुरदरी और कांटेदार हो गई थी. बच्ची को 16 जून को इलाज के लिए एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया था. एम्स के त्वचा रोग विभाग के विशेषज्ञों ने बीमारी को दुर्लभ इच्थियोसिस हाइस्ट्रीक्स बताया है. विशेषज्ञों के अनुसार देश में चिकित्सा इतिहास के दौरान इस तरह का मामला दूसरी बार सामने आया है.

जेनेटिक जांच में मिला नए म्यूटेशन का संकेत

एम्स के त्वचा रोग विभागाध्यक्ष एवं विशेषज्ञ प्रो. डॉ. सत्याकि गांगुली ने बताया कि जेनेटिक जांच में बच्ची के परिवार में इस तरह की बीमारी का कोई पूर्व इतिहास नहीं मिला. हालांकि जांच में एक नए जेनेटिक म्यूटेशन का संकेत मिला है. इसे देखते हुए यह एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति मानी जा रही है.
उन्होंने बताया कि जब बच्ची एम्स पहुंची थी, तब त्वचा के अत्यधिक सूखकर सख्त हो जाने के कारण उसके हाथ-पैरों की गतिविधियां प्रभावित हो रही थीं.

इसके चलते जोड़ों से जुड़ी समस्या भी शुरू हो गई थी। त्वचा की बायोप्सी और जेनेटिक जांच के बाद आर्थोपेडिक्स विशेषज्ञों की मदद से इस समस्या का उपचार किया गया। अब त्वचा पर बनी मोटी और गंभीर परतों में कमी आई है.

आठ विशेषज्ञों की टीम कर रही इलाज

बच्ची की स्थिति को देखते हुए एम्स के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) के निर्देश पर चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. डीके त्रिपाठी ने बहुविषयक चिकित्सकीय टीम गठित की. इसमें त्वचा रोग विशेषज्ञ प्रो. डॉ. गांगुली और डॉ. नम्रता छाबड़ा के साथ बाल रोग, जेनेटिक्स, पोषण, मेडिकल सोशल सर्विस सहित अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया गया. एम्स प्रबंधन के अनुसार बच्ची के उपचार में केवल त्वचा रोग पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि उसके पोषण, मानसिक स्थिति और सामाजिक जरूरतों को भी उपचार का हिस्सा बनाया गया है.

शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी मिली

जांच के दौरान बच्ची के शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी सामने आई थी. इसके लिए पोषण विशेषज्ञों की टीम लगातार आवश्यक सहायता दे रही है. बच्ची और उसके साथ आए परिजन हिंदी नहीं समझते हैं. ऐसे में पिछले 55 दिनों से गोंडी भाषा समझने वाले दुभाषिये की मदद से चिकित्सकीय सलाह और जरूरी निर्देश उन्हें समझाए जा रहे हैं.

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बीमारी का स्थायी इलाज नहीं, दो महीने की दवा के साथ होगी छुट्टी

एम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डीके त्रिपाठी ने बताया कि इस बीमारी का स्थायी इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है. बच्ची की स्थिति में सुधार के बाद उसे डिस्चार्ज करते समय दो महीने की दवाएं दी जाएंगी और नियमित देखभाल के लिए दंतेवाड़ा भेजा जाएगा. उन्होंने बताया कि बच्ची की आगे की देखभाल के लिए गैर सरकारी संगठन और बाल संरक्षण आयोग से भी चर्चा की जा रही है, ताकि इलाज के बाद भी उसे नियमित चिकित्सा, पोषण और अन्य जरूरी सहायता मिलती रहे.

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