Shatak Movie Review: AI और Real Actors, बिना प्रोपगैंडा, बिना लाग लपेट, RSS के 100 सालों की कहानी को दिखाती एक बढ़िया फिल्म

Shatak Movie Review: भारत के राजनीतिक और सामाजिक हालात बदले हैं, लेकिन एक संगठन अपनी शुरुआत से ही चर्चा, विवाद और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS).
Shatak Movie Review

फिल्‍म शतक रिव्‍यू

Shatak Movie Review: आज के समय में सोशल मीडिया के डिजिटल कॉरिडोर से लेकर चाय की दुकानों और गलियों तक राय बनती और बदलती रहती है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस बदलते माहौल की जड़ें कहां हैं? अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो हमें लगभग एक सदी पीछे जाना होगा. समय का पहिया घूमा है, भारत के राजनीतिक और सामाजिक हालात बदले हैं, लेकिन एक संगठन अपनी शुरुआत से ही चर्चा, विवाद और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS). इसे लेकर लोगों के मन में अक्सर कई सवाल उठते हैं, जैसे क्या गांधी जी की हत्या में संघ का हाथ था, क्या आजादी की लड़ाई में संघ की कोई भूमिका थी, गांधी जी और संघ प्रमुख के रिश्ते कैसे थे, युद्ध के समय संघ ने क्या काम किया, क्या नेहरू जी और इंदिरा जी ने संघ पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की? ये सवाल इसलिए भी बार-बार सामने आते हैं क्योंकि इन्हें हम विभिन्न मंचों पर लगातार सुनते रहते हैं. ऐसे ही सवालों के बीच एक फिल्म आई है, जिसका नाम है ‘शतक’, जो RSS के 100 साल के सफर को पर्दे पर उतारने का दावा करती है.

20 फरवरी को थिएटर में रिलीज हुई फिल्म ‘शतक’ पुराने दौर को आज के नजरिए से देखने की एक गंभीर और बड़ी कोशिश है. किसी भी मुद्दे को घुमा-फिराकर पेश करने के बजाय यह कहानी को सरल शब्दों में दर्शकों के सामने रखती है. फिल्म दिखाती है कि कैसे 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर की एक छोटी सी गली में शुरू हुआ एक विचार आज दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में से एक बन गया. यह फिल्म अतीत और वर्तमान के बीच एक सीधा पुल बनाती है, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि आज का भारत बीते संघर्षों और संकल्पों से कैसे आकार लिया है. 1 घंटे 52 मिनट की इस फिल्म में इतना कंटेंट समेटा गया है, जिसे दिखाना आसान नहीं था, और दर्शकों को संघ के बारे में कई ऐसी बातें जानने को मिलती हैं, जो शायद उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी हों. फिल्म यह दावा करती है कि इसमें दिखाया गया हर पहलू संघ के 100 साल के इतिहास का हिस्सा है.

कहानी

फिल्म की कहानी 1925 से शुरू होती है, जब डॉक्टर केशव बालीराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की. उनके बचपन, उनके विचारों और उनके सामने आई चुनौतियों को फिल्म के पहले भाग में विस्तार से दिखाया गया है. साथ ही यह भी दिखाया गया है कि आजादी की लड़ाई के दौरान संघ क्या कर रहा था. इसके बाद दूसरे भाग में गुरुजी यानी एम. एस. गोलवलकर के दौर को दिखाया गया है और यह समझाया गया है कि उन्होंने संगठन को किस तरह आगे बढ़ाया. फिल्म यह भी बताती है कि संघ ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश क्यों नहीं किया और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने पर कैसे फोकस रखा. ‘शतक’ की शुरुआत एक ऐसे माहौल से होती है, जहां संसाधन सीमित हैं, न बड़ी इमारतें हैं और न ही भारी भीड़, लेकिन सोच और संकल्प बहुत बड़े हैं. फिल्म की स्क्रिप्ट संतुलित और नियंत्रित है. कहीं भी जल्दबाजी महसूस नहीं होती, बल्कि कहानी धीरे-धीरे दर्शकों को उस दौर में ले जाती है, जहां एक छोटे से बीज को बोया जा रहा था. पूरी फिल्म में RSS की यात्रा को क्रमबद्ध तरीके से समेटने की कोशिश की गई है.

कैसी है फिल्म

यह फिल्म 1 घंटे 52 मिनट में इतनी जानकारी देती है कि दर्शक कई बार हैरान रह जाता है. पहला ही सीन सीधे मुद्दे पर आता है और कहानी बिना समय गंवाए साल-दर-साल संघ की स्थापना और देश में उसकी भूमिका को सामने रखती है. वॉयस ओवर का प्रभावी इस्तेमाल कहानी को गति देता है. कुछ ऐसी जानकारियां सामने आती हैं, जो आमतौर पर कम सुनी गई हैं और वे दर्शकों को चौंकाती हैं. फिल्म में कहीं भी अनावश्यक खींचतान नहीं की गई है और न ही किसी को सीधे तौर पर टारगेट किया गया है. गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी को भी कुछ समय के लिए दिखाया गया है, लेकिन उनके बारे में केवल नकारात्मक बातों पर फोकस नहीं किया गया. फिल्म का केंद्र संघ की कहानी है. यदि फिल्म में दिखाए गए दावे तथ्यात्मक रूप से सही हैं, तो यह वाकई कई दर्शकों के लिए नई और चौंकाने वाली जानकारी हो सकती है. आजादी के बाद के दौर में भी संघ की भूमिका को विस्तार से दिखाया गया है, जिसे आमतौर पर कम चर्चा मिलती है.

फिल्म को हाइब्रिड तकनीक से बनाया गया है, यानी AI और वास्तविक कलाकारों दोनों का उपयोग किया गया है, ऐसा मेकर्स का दावा है. हालांकि AI का प्रभाव बहुत कम दृश्यों में महसूस होता है. युद्ध के दृश्यों में VFX का इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता है. कुछ जगह ऐसा लगता है कि जरूरत से ज्यादा जानकारी दे दी गई है, लेकिन 100 साल के इतिहास को समेटना आसान नहीं था और फिल्म को लंबा भी नहीं किया गया. कुल मिलाकर यह फिल्म जानकारीपूर्ण है और अपने उद्देश्य को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है.

डायरेक्शन और प्रोडक्शन

फिल्म के निर्देशक आशीष मॉल ने विषय पर मजबूत पकड़ दिखाई है. उन्होंने कहानी को अनावश्यक रूप से भावनात्मक बनाने से परहेज किया है. जहां रुकने की जरूरत होती है, वहां फिल्म ठहरती है और दर्शकों को सोचने का मौका देती है. प्रोड्यूसर वीर कपूर का सहयोग फिल्म के स्केल और प्रोडक्शन वैल्यू में स्पष्ट नजर आता है. पूरी फिल्म में विषय के प्रति सम्मान और ईमानदारी दिखाई देती है. इसे सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि कहानी को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ाया गया है.

म्यूजिक

फिल्म का संगीत प्रभावशाली है और कहानी के भाव के अनुरूप आगे बढ़ता है. सनी इंदर और शांतनु शंकर का संगीत दर्शकों को बांधे रखता है. शंकर महादेवन, शान और सुरेश वाडेकर की आवाज में गाए गए गीत फिल्म के प्रभाव को और मजबूत बनाते हैं. कुल मिलाकर यदि आप संघ के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो यह फिल्म देखने लायक है.

लेखन और कॉन्सेप्ट

किसी भी फिल्म की आत्मा उसकी स्क्रिप्ट होती है. नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने जिस तरह सौ साल के सफर को शब्दों में पिरोया है, वह सराहनीय है. विषय गंभीर है और इसमें कई राजनीतिक विवादों की संभावना थी, लेकिन लेखकों ने कहानी को सीधा और स्पष्ट रखा है. अनिल धनपत अग्रवाल का मूल कॉन्सेप्ट इस फिल्म की रीढ़ है. उनका उद्देश्य किसी संगठन की जीत दिखाना भर नहीं था, बल्कि एक विचार की निरंतरता को सामने लाना था. इस दृष्टि का प्रभाव पूरी फिल्म में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

कमियां

हर फिल्म की तरह ‘शतक’ में भी कुछ कमियां हैं. सबसे बड़ी चुनौती इसकी गति है. सौ साल के इतिहास को समेटने के कारण कई जगह फिल्म डॉक्यूमेंट्री जैसी लगने लगती है, जिससे मनोरंजन का तत्व थोड़ा कम हो जाता है. कुछ कठिन और विवादास्पद सवालों को गहराई से छूने के बजाय सरल तरीके से छोड़ दिया गया है, जो गंभीर दर्शकों को खटक सकता है. CGI और VFX का अधिक इस्तेमाल कुछ दृश्यों को कृत्रिम बनाता है, जिससे भावनाओं का स्वाभाविक प्रभाव कम हो जाता है. साथ ही कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तियों को स्क्रीन पर कम समय मिला है, जिससे उनके योगदान का पूरा प्रभाव सामने नहीं आ पाता.

मूवी का सारांश

‘शतक’ सिर्फ एक ऐतिहासिक फिल्म या किसी संगठन का प्रचार नहीं है. यह विश्वास, धैर्य और प्रतिबद्धता की ताकत को दर्शाने वाली फिल्म है, जो शोर मचाने के बजाय शांतिपूर्वक काम करने की भावना को सामने रखती है. भले ही फिल्म कुछ कठिन सवालों से बचती हुई नजर आए, लेकिन यह राष्ट्र निर्माण से जुड़े बुनियादी पहलुओं को मजबूती से प्रस्तुत करती है. अंतिम दृश्यों तक पहुंचते-पहुंचते दर्शक न केवल सौ साल के इतिहास को समझता है, बल्कि उसे महसूस भी करता है. कुल मिलाकर यह फिल्म परिवार के साथ देखी जा सकती है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार.

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