लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर 850, दक्षिणी राज्यों में विरोध का तूफान क्यों? सब कुछ जानिए

केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाले संसद के विशेष सत्र के दौरान तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की तैयारी कर ली है.
Delimitation Bill

तीन महत्वपूर्ण विधेयक

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और बिहार में नेतृत्व परिवर्तन से यदि आप ध्यान हटाएंगे तो देश का सबसे जटिल और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने खड़ा है. केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाले संसद के विशेष सत्र के दौरान तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की तैयारी कर ली है. इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 शामिल हैं.

543 से बढ़ाकर 850 करने का प्लान

प्रस्ताव के मुताबिक लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्लान है. इनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें शामिल हैं. यह बदलाव 1971 की जनगणना पर आधारित पुरानी व्यवस्था को अपडेट करने और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए किया जा रहा है.

क्यों ज़रूरी है परिसीमन?

परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया का मतलब है कि लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से तय करना. वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना पर टिकी हुई हैं, जबकि भारत की आबादी में भारी वृद्धि हो चुकी है. 84वें संशोधन के तहत 2026 तक सीटों की संख्या फ्रीज थी.

2011 की जनगणना

सरकार अब 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करके सीटों का पुनर्वितरण करना चाहती है, ताकि हर नागरिक का प्रतिनिधित्व समान हो सके. सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में नया परिसीमन आयोग क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करेगा, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं के लिए आरक्षण वाले सीटें चिन्हित करेगा. ग़ौरतलब है कि महिला आरक्षण 15 वर्षों के लिए होगा.

सरकार का तर्क

सरकार का तर्क है कि पुरानी व्यवस्था अब न्यायपूर्ण नहीं रही. हालाँकि, आबादी को ध्यान में रखते हुए दक्षिण के राज्य संदेह से भरे हैं. उनका मानना है कि परिवार नियोजन अपनाने के चलते आबादी का घनत्व उनके यहाँ कम है, ऐसे में उत्तर और मध्य भारत के राज्यों की सीटें दक्षिण की तुलना में बढ़ जाएँगी. लेकिन, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि दक्षिणी राज्य परिवार नियोजन में सफल रहे हैं, इसलिए उनकी जनसंख्या घनत्व कम है. फिर भी आनुपातिक बढ़ोतरी से हर राज्य को फायदा होगा. कोई राज्य सीटें नहीं खोएगा.

सरकार का दावा है कि यह कदम संघीय संतुलन बनाए रखते हुए प्रतिनिधित्व को मजबूत करेगा और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएगा.

विपक्ष और दक्षिणी राज्यों का तीखा विरोध

विपक्षी दलों, खासकर दक्षिण भारत के नेताओं ने इस मसौदे को “अन्याय” और “संघीय ढांचे पर हमला” बताया है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेतावनी दी कि अगर राज्य के साथ अन्याय हुआ तो बड़े पैमाने पर आंदोलन होगा. तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर सभी दलों की बैठक बुलाने की मांग की और कहा कि जनसंख्या आधारित मॉडल दक्षिणी राज्यों के लिए स्वीकार्य नहीं है. कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को सजा नहीं मिलनी चाहिए.

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस मसले पर विसात्र से अपने विचार रखे हैं. चिदंबरम ने शक के पीछे कई बुनियादी तर्क दिए हैं. उनके मुताबिक़- लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 से 815 तक 50 प्रतिशत बढ़ाने पर तमिलनाडु की सीटें 39 से 58 दिखाई देंगी, लेकिन परिसीमन के बाद यह घटकर 46 रह जाएगी. दक्षिणी राज्यों का वर्तमान 24.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व घटकर 20.7 प्रतिशत हो जाएगा. यह संतुलन बिगाड़ने की चाल है. वहीं, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी लिखा कि कोई भी बढ़ोतरी न्यायपूर्ण होनी चाहिए, वरना संवैधानिक सिद्धांत कमजोर होंगे. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने 2011 जनगणना के आधार पर अनुमानित सीट वितरण साझा किया, जिसमें उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी आबादी वाले राज्यों को बहुत ज्यादा फायदा दिखाया गया.

दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) का मुख्य तर्क है कि वे सफल परिवार नियोजन नीतियों के कारण जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण रख पाए. इनकी कुल प्रजनन दर (TFR) राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. अगर सिर्फ जनसंख्या को आधार बनाया गया तो उत्तर प्रदेश (वर्तमान 80 सीटों से बढ़कर 120-140 तक), बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सीटें तेजी से बढ़ेंगी, जबकि दक्षिण का संसद में प्रभाव घटेगा. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश और केरल के बीच सीटों का अंतर 60 से बढ़कर 90 हो सकता है. विपक्ष इसे ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ विभाजन को बढ़ावा देने वाला कदम बता रहा है, जो संघीय भावना को नुकसान पहुंचाएगा.

कांग्रेस ने इसे ‘महिला आरक्षण की आड़ में बैकडोर परिसीमन’ करार दिया है. पार्टी का कहना है कि 2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने के नाम पर राजनीतिक फायदे के लिए सीटों का नया बंटवारा किया जा रहा है. कुछ विपक्षी नेता गेरिमैंडरिंग (सीमा हेरफेर) की आशंका भी जता रहे हैं, जैसा जम्मू-कश्मीर परिसीमन में देखा गया.

संभावित प्रभाव और आगे की राह

यदि प्रस्ताव पास होता है तो लोकसभा में कुल सीटें बढ़ने से संसद का कामकाज प्रभावित हो सकता है. SC/ST आरक्षण भी नए आंकड़ों के आधार पर तय होगा. वैसे तीन दिनों के विशेष सत्र के दौरान बहस तीखी होने की संभावना है. राहुल गांधी लोकसभा में और सोनिया गांधी राज्यसभा में पार्टी की स्थिति रख सकते हैं.

कुल मिलाकर यह विवाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सवाल को उठाता है. मसलन, प्रतिनिधित्व का आधार क्या हो? शुद्ध जनसंख्या या विकास, संघीय संतुलन और जनसंख्या नीतियों को प्रोत्साहन? दक्षिणी राज्य बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं, जबकि केंद्र इसे राष्ट्रीय हित में सुधार बता रहा है.

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