स्कूल से राष्ट्रपति भवन तक का सफर! जान लीजिए क्यों हर साल 5 सितंबर को मनाते हैं टीचर्स डे
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
Teachers Day 2026: भारत एक ऐसा देश है, जहां प्राचीन काल से ही कई ऐसे गुरु हुए जिन्होंने अपने मार्गदर्शन से शिष्यों के जीवन में एक नई क्रांति लाई. उनके जीवन से अंधकार को हटकर प्रकाश की ज्योति जलाई. जब भारत आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहा था, तब देश में एक ऐसे महान शिक्षक, दार्शनिक और राजनेता हुए जिनकी जयंती के अवसर पर देश हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने ज्ञान और समर्पण से यह साबित कर दिया कि ऐसा कोई भी पद या उच्च कोटि की कुर्सी नहीं है, जिसमें किसी विद्वान व्यक्ति को जगह न मिले.
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ज्ञान और समर्पण भाव को देखते हुए उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया था. राधकृष्णन का देश के इस सर्वोच्च पद पर पहुंचना आसान नहीं था, उन्होंने अपने जीवन में कई चुनौतियों को पार कर इस मुकाम को हासिल किया, जिस वजह से देश आज उनकी जयंती को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है. आइए जानते हैं कि राधाकृष्णन कैसे एक सामान्य शिक्षक से उठकर राष्ट्र की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे.
एक शिक्षक के रूप में करियर की शुरुआत
डॉ. सर्वपल्ली राधकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में हुआ था, जहां आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने दर्शनशास्त्र में हायर एजुकेशन पूरा किया. मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से बतौर टीचर अपने सफर की शुरुआत की. राधाकृष्णन कठिन विषयों को भी बहुत आसान और प्रभावशाली भाषा में समझाते थे. अपने गहरे ज्ञान और समर्पण के बल पर उन्होंने एक शिक्षक के रूप में समाज में एक खास पहचान बनाई.
प्रोफेसर से कुलपति बने डॉ. राधाकृष्णन
प्रोफेसर के रूप में मैसूर और कलकत्ता विश्वविद्यालय में डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी सेवाए दी. आगे चलकर उन्हें आंध्र विश्वविद्यालय और BHU के कुलपति की जिम्मेदारी सौंपी गई. कुलपति के पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और अनुशासन को बेहतर बनाने पर विशेष जोर दिया.
उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे डॉ. राधाकृष्णन
डॉ. राधाकृष्णन साल 1952 में देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और उन्होंने 10 सालों तक राज्यसभा के सभापति के रूप में निष्पक्ष काम किया. उनकी इसी व्यवहार से प्रभावित होकर उन्हें देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर बैठाया गया. राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षक वाली सादगी नहीं छोड़ी और हमेशा शिक्षा पर जोर दिया.
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शिक्षक दिवस की शुरुआत कैसे हुई?
जब उनके दोस्तों ने डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन मनाना चाहा, तब उन्होंने इसे अपने नाम के बजाय देश के सभी शिक्षकों को समर्पित करते हुए ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाने को कहा. वह मानते थे कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्मण का सबसे मजबूत साधन है. यही वजह है कि हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस से रूप में मनाया जाने लगा, जो आज भी जारी है.