Explained: महाराष्ट्र की राजनीति में ‘पवार’ विरासत का नया अध्याय… शोक, शक्ति और सुनेत्रा का उदय

Explained: महाराष्ट्र को पहली महिला उप मुख्यमंत्री मिलने वाली हैं. इसी के साथ राज्य की राजनीति में 'पवार' विरासत का नया अध्याय भी शुरु हो रहा है. पढ़ें सुनेत्रा पवार के उदय की कहानी-
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सुनेत्रा पवार का उदय

Explained: महाराष्ट्र की राजनीति आज 31 जनवरी 2026 को एक ऐसी पटकथा की साक्षी बनने जा रही है, जिसकी कल्पना कुछ दिनों पहले तक किसी ने नहीं की थी. एक तरफ प्रदेश एक कद्दावर और ‘पावरफुल’ नेता अजित पवार के आकस्मिक निधन के शोक में डूबा है, तो दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में स्थिरता की भारी जद्दोजहद चल रही है. राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार आज महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रही हैं.

यह शपथ ग्रहण केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अजित पवार के जाने से पैदा हुए उस विशाल राजनीतिक शून्य को भरने की कोशिश है जिसने महायुति सरकार और एनसीपी के अस्तित्व के सामने सवाल खड़े कर दिए थे.

वैक्यूम को भरने की चुनौती: विमान दुर्घटना से शपथ ग्रहण तक

    अजित पवार केवल एक उपमुख्यमंत्री नहीं थे; वे एनसीपी (अजित गुट) की रीढ़ और प्रशासन पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले नेता थे. उनकी अचानक मृत्यु ने सरकार के भीतर एक ऐसा ‘पावर वैक्यूम’ पैदा किया, जिससे सत्ता का संतुलन बिगड़ने का डर था.

    सुनेत्रा पवार को इस पद पर बिठाना पार्टी की एक रणनीतिक मजबूरी और भावनात्मक कार्ड दोनों है. शनिवार दोपहर विधायकों की बैठक में उन्हें नेता चुना जाना और फिर शाम करीब 5 बजे लोक भवन में शपथ ग्रहण की तैयारी यह बताती है कि पार्टी किसी भी तरह की देरी करके विरोधियों को सेंधमारी का मौका नहीं देना चाहती.

    सुनेत्रा पवार: पर्दे के पीछे से सत्ता के शिखर तक

    सुनेत्रा पवार के लिए यह सफर चुनौतीपूर्ण रहा है. भले ही वे राजनीतिज्ञ पदमसिंह पाटिल की बेटी और अजित पवार की पत्नी हैं, लेकिन उनकी सक्रियता अधिकतर सामाजिक क्षेत्रों तक सीमित थी.
    राजनीतिक पृष्ठभूमि: 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया था. अब सीधे उपमुख्यमंत्री का पद संभालना उनके लिए एक बड़ी छलांग है.
    सामाजिक आधार: ‘एनवायर्नमेंटल फोरम ऑफ इंडिया’ और ‘विद्या प्रतिष्ठान’ जैसी संस्थाओं के जरिए उन्होंने ग्रामीण महाराष्ट्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जो अब उनके काम आएगी.

    संवैधानिक स्थिति और बारामती की राह

    चूंकि सुनेत्रा पवार फिलहाल महाराष्ट्र विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य नहीं हैं, इसलिए अनुच्छेद 164(4) के तहत वे आज शपथ तो ले लेंगी, लेकिन उन्हें 6 महीने के भीतर सदन की सदस्यता लेनी होगी. माना जा रहा है कि वे अपने दिवंगत पति की सीट बारामती से उपचुनाव लड़ेंगे. यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य का सबसे बड़ा ‘लिटमस टेस्ट’ होगा.

    विभागों का पेच: क्या ‘खजाना’ उन्हें मिलेगा?

    अजित पवार के पास वित्त मंत्रालय जैसा सबसे शक्तिशाली विभाग था. आज होने वाली शपथ के साथ यह सवाल भी खड़ा है कि क्या सुनेत्रा को वही विभाग मिलेंगे?
    • राजनीतिक संकेत: चर्चा है कि बजट सत्र के करीब होने के कारण फिलहाल वित्त विभाग मुख्यमंत्री के पास रह सकता है, जबकि सुनेत्रा को अन्य महत्वपूर्ण विभाग दिए जा सकते हैं. उन्हें धीरे-धीरे प्रशासनिक कमान सौंपी जाएगी ताकि वे व्यवस्था को समझ सकें.

    एनसीपी का भविष्य और ‘विलय’ की आहट

    छगन भुजबल और सुनील तटकरे जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सुनेत्रा के नाम पर मुहर लगाकर यह दिखाने की कोशिश की है कि पार्टी एकजुट है. हालांकि, पर्दे के पीछे शरद पवार गुट के साथ विलय की चर्चाएं भी तैर रही हैं. सुनेत्रा के लिए चुनौती केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अपने 40 विधायकों को एकजुट रखना भी होगा, जो अजित पवार के व्यक्तित्व के कारण साथ जुड़े थे.

    बीजेपी की भूमिका: स्थिरता को प्राथमिकता

    मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी आलाकमान ने इस फैसले को अपनी पूरी मंजूरी दी है. बीजेपी जानती है कि आगामी चुनावों से पहले एनसीपी कैडर को बिखरने से रोकना गठबंधन के हित में है. सुनेत्रा पवार का डिप्टी सीएम बनना महायुति के लिए एक ‘इमोशनल स्टेबलाइजर’ का काम करेगा.

      कुल मिलाकर सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक क्षण है, लेकिन उनकी असली परीक्षा आज शपथ लेने के बाद शुरू होगी. उन्हें-
      • अजित पवार की आक्रामक कार्यशैली और प्रशासनिक पकड़ की बराबरी करनी होगी.
      • पार्टी के भीतर असंतोष को रोकना होगा.
      • बारामती के गढ़ को भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बचाना होगा.

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      सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना महाराष्ट्र के इतिहास में एक मील का पत्थर है, वे इस पद तक पहुंचने वाली राज्य की पहली महिला हैं. लेकिन यह उपलब्धि एक गहरी त्रासदी और भारी राजनीतिक दबाव के बीच आई है. उनका यह कार्यकाल ‘सहानुभूति’ और ‘सामर्थ्य’ के बीच का एक संतुलन होगा.

      सुनेत्रा पवार के लिए यह नियुक्ति केवल एक पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि एक कठिन युद्ध का प्रारंभ है. उन्हें न केवल अजित पवार की आक्रामक कार्यशैली और प्रशासनिक पकड़ की बराबरी करनी होगी, बल्कि शरद पवार जैसे राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ के सामने अपनी पार्टी के अस्तित्व को बिखरने से भी बचाना होगा. क्या वह अपनी इस नई भूमिका में एक स्वतंत्र और सशक्त राजनेता के रूप में उभर पाएंगी, या फिर वे केवल विरासत की संरक्षक बनकर रह जाएंगी? इसका फैसला आने वाले 6 महीने और बारामती की जनता करेगी. आज की शपथ महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात है, जहां ‘पवार’ बनाम ‘पवार’ की जंग अब एक नए और भावनात्मक मोड़ पर पहुंच गई है.

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