‘परिक्रमा कृपा सार’ पर जयपुर में संवाद, कैबिनेट मंत्री प्रह्लाद पटेल बोले- यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आत्मा की परिक्रमा

Parikrama Kripa Sar: जयपुर में प्रह्लाद सिंह पटेल ने मां नर्मदा की परिक्रमा से जुड़े अपने अनुभवों और आत्मिक यात्राओं का सार साझा किया. उन्होंने बताया कि परिक्रमा केवल नदी की परिक्रमा नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है.
Prahlad Singh patel

मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल

Jaipur: मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल की नर्मदा परिक्रमा पर आधारित पुस्तक ‘परिक्रमा कृपा सार’ पर शनिवार को जयपुर में एक सार्थक, विचारोत्तेजक और आध्यात्मिक संवाद का आयोजन हुआ. राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के गरिमामय परिसर में संपन्न यह परिचर्चा केवल पुस्तक परिचर्चा या समीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन-दर्शन, साधना और समकालीन सामाजिक सरोकारों से जुड़ा एक जीवंत विमर्श बन गया.

कार्यक्रम में प्रहलाद सिंह पटेल ने मां नर्मदा की परिक्रमा से जुड़े अपने अनुभवों और आत्मिक यात्राओं का सार साझा किया. उन्होंने बताया कि परिक्रमा केवल नदी की परिक्रमा नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है. इसी संदर्भ में उन्होंने युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को केवल आस्था नहीं देती, बल्कि उसे कर्म, रोजगार और अवसरों के प्रति सजग और समर्थ भी बनाती है. उनके अनुसार, जब जीवन में उद्देश्य और साधना का संतुलन होता है, तब व्यक्ति स्वयं अपने लिए मार्ग निर्मित करता है.

मंत्री ने दूसरी बार की नर्मदा परिक्रमा

‘परिक्रमा कृपा सार’ लेखक के जीवनानुभवों, आत्मिक खोज और श्रद्धा का सघन संकलन है. पुस्तक में मां के प्रति निःशर्त श्रद्धा, गुरु-शक्ति में अडिग विश्वास और मां नर्मदा की कृपा का भावपूर्ण वर्णन है. बता दें, पटेल ने मां नर्मदा की परिक्रमा दो बार की है. पहली बार अपने परम गुरु बाबा श्री के सान्निध्य में और दूसरी बार सपत्नीक. यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आत्मा की परिक्रमा हैं, जिनके अनुभव इस कृति में साधना और संवेदना के रूप में साकार हुए हैं.

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी भी रहे मौजूद

कार्यक्रम की विशेष गरिमा बढ़ाई वरिष्ठ स्तंभकार, लेखक और पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की उपस्थिति ने. परिचर्चा के दौरान उन्होंने पुस्तक के वैचारिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि वे लंबे समय से स्त्री तत्व पर चिंतन कर रहे हैं, और इस पुस्तक में पौरुष तत्व तथा मां की भूमिका का संतुलित विवेचन उन्हें गहराई से प्रभावित करता है. उन्होंने बाबा श्री के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि “यदि पौरुष जागता है तो मानव पारस बन सकता है”। यह कथन मानव जीवन के गूढ़ दर्शन को उद्घाटित करता है और सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराता है.

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पूरे आयोजन के दौरान वातावरण आध्यात्मिक ऊष्मा और वैचारिक गंभीरता से ओतप्रोत रहा. श्रोताओं ने पुस्तक के भावों को केवल सुना नहीं, बल्कि आत्मसात किया. इस सार्थक संवाद के समन्वयक देवेंद्र शर्मा रहे, जबकि सामाजिक और साहित्यिक जगत के अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति ने आयोजन को और भी अर्थपूर्ण बना दिया. यह परिचर्चा साहित्य, संस्कृति और अध्यात्म के सुंदर संगम के रूप में स्मरणीय रही.

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