झाबुआ: कागजों पर ‘मृत’, हकीकत में ‘जिंदा’, अधिकारियों की एक लापरवाही और दिव्यांग की जिंदगी बन गई तमाशा
पीड़ित की तस्वीर
आपने मशहूर अभिनेता पंकज त्रिपाठी की फिल्म ‘कागज’ तो जरूर देखी होगी. फिल्म में कहानी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है जिस सरकारी दफ्तरों में मृत घोषित कर दिया गया है. ऐसा ही एक मामला झाबुआ जिले से सामने आया है. दरअसल मंगलवार को झाबुआ जिले के थांदला में एक जिला स्तरीय जनसुवनाई आयोजित की गई थी. इस सुनवाई कलेक्टर साहब को एक ऐसे मामले के बारे में पता चला जिसे सुनकर वह हैरान रह गए.
यह कहानी है मेघनगर विकासखंड के ग्राम पंचायत मदरानी की. यहां आयोजित जनसुनवाई को कलेक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट सुन रहे थे.
इस जनसुनवाई में 98 प्रतिशत विकलांग बादरसिंह मुनिया थांदला भी पहुंचे हुए थे. जब बादर सिंह मुनिया का नंबर आया तो उन्होंने बताया कि लगभग 2 वर्ष पहले अधिकारियों की लापरवाही से समग्र आईडी में से उनका नाम हटा दिया गया था.
दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर
समग्र आईडी में जब वह नाम जुड़वाने के लिए संबंधित पंचायत में पहुंचे तो पता चला कि उन्हें विभाग द्वारा मृत घोषित कर दिया गया है. यह सुनते ही 98% विकलांग बादर सिंह मुनिया के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. पिछले दो वर्षों से बादरसिंह मुनिया दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं. अपने आप को जीवित साबित करने के लिए ऑफिस के चक्कर लगा रहे हैं.
थक-हार कर बादरसिंह मुनिया मंगलवार को कलेक्टर द्वारा आयोजित जनसुनवाई में पहुंचे. कलेक्टर को आवेदन दिया. इसके बाद मामला कलेक्टर के संज्ञान में आते ही विभागीय हरकत शुरु हुई. संबंधित विभागों को फटकार लगाई है. त्रुटि को सुधारने के निर्देश दिए गए. आखिरकार 2 वर्षों की भागादौड़ी के बाद दिव्यांग बादरसिंह मुनिया को अब लग रहा है, कि वह जीवित है.
बेपरवाह सिस्टम!
लेकिन 2 वर्षों तक परेशान हुए बादरसिंह मुनिया कितने मानसिक तनाव में रहे. यह वही बता सकते हैं या उनका परिवार. यही नहीं बादर सिंह मुनिया को इस दौरान न हीं पेंशन मिल पाई और ना ही 2 वर्षों से खाद्यान्न मिल पाया. मिला तो सिर्फ दर-दर की ठोकरे. इस पूरे घटनाक्रम को देख कर लगता है कि सिस्टम कितना बेपरवाह है और धारावाहिक ऑफिस ऑफिस कितना सत्य.
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