Opinion: …तो इसलिए अमेरिका ने वेनेजुएला को दबोचा

US Venezuela Tension: अमेरिका ने रणनीति के तहत एंटी-ड्रग्स मुहीम छेड़ी, शैडो-फ्लीट पर पाबंदी लगा दी, तीस नौकायें नष्ट कर दीं और बंदरगाहों की नाकाबंदी कर दी। मादुरो पर पहले 15 मिलियन डालर का ईनाम था, जो ट्रंप के पुन: सत्ता में आने पर 25 मिलियन डॉलर और हाल में बढ़ाकर 50 मिलियन डॉलर कर दिया गया। यह एक बड़ी रकम है।
america venezuela tension nicolas maduro and donald trump

निकोलस मादुरो और डोनाल्ड ट्रंप

US Venezuela Tension: सब कुछ आईने की मानिंद साफ है। कहीं कुछ भी कुहरिल या गोपन नहीं। वेनेजुएला में तीन जनवरी शनिवार की स्याह सर्द रात में जो कुछ हुआ वह अमेरिकी नव उपनिवेशवाद का ऐसा खूंखार आक्रामक चेहरा है जिस पर निर्लज्ज्ता का लेप नजर आता है। भूमिका बरसों से बन रही थी, किंतु यह अंदेशा कतई नहीं था कि राष्ट्र‌पति डोनाल्ड ट्रम्प के निर्देश पर अमेरिकी डेल्टा फोर्स काराकास में ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व को इस तरह अंजाम देंगे। अमेरिकी सेना ने मुहिम को इस खूबी से संचालित किया कि किसी को पेशगी भनक भी न लगी।

वेनेजुएला के सुरक्षा-बल कोई प्रतिरोध नहीं कर सके और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो अप‌नी पत्नी सिलिया फ्लोरेंस के साथ-डेल्टा फोर्स के हत्थे चढ़ गये। वह राजधानी काराकास में सैनिक अड्डे में पत्नी के साथ निश्चिंत सो रहे थे कि अमेरिका के फौजी जवानों ने उन्हें दबोच लिया। मादुरो ने नजदीकी इस्पाती कक्ष में भागने की कोशिश कीं, किंतु असफल रहे। उन्हें बलात खींचते हुये बाहर ले जाया गया। उन्हें हथकड़िया पहनाई गयी और आँखों पर पट्टी बाँध दी गई। कुछ ‌ही घंटों बाद वह अमेरिका में थे। इस दशा में वह लोअर मैनहट्टन में थे और उपस्थित जनों को ‘गुडनाइट’ और हैप्पी न्यू इयर’ कहते पाये गये। अमेरिकी डिटेंशन सेंटर में रखे गये मादुरो पर अब मादक पदार्थों की तस्करी व अन्य अपराधों के लिये अमेरिकी कानून के तहत मुकदा चलेगा। इस मुकदमें के फैसले का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

अमेरिकी सेना को इस आक्रामक कारवाई के पूरा करने में बमुश्किल तीस मिनट लगे। जिस टुकड़ी ने इसे संपन्न किया, उसे फौज की एलीट टुकड़ी माना जाता है। इस कथित भद्र टुकड़ी ने पिछली लगभग एक छमाही में खूब तैयारी और अभ्यास किया। मादुरो क्या खाते हैं कहाँ जाते हैं और क्या पहनते हैं, यहाँ तक कि उनके पेटस (कुत्तों) की गतिविधियों की राई रत्ती जानकारी जुटाई गयी। रिहर्सल के लिये उनके ठिकाने की अनुकृति तैयार की गयी और चाक-चौबंद इंतजाम के बाद मिशन को अंजाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिका ने आधुनिकतम अपाचे हेलीकाप्टरों का भी इस्तेमाल किया। गौरतलब है कि अपाचे के साथ प्रतिरोध का ऐतिहासिक जनजातीय संदर्भ जुड़ा हुआ है।

यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि अमेरिका को अपनी आक्रामक सैन्य कार्रवाई में किसी प्रतिरोध का सामना क्यों नहीं करना पड़ा़? अमेरिकी पाबंदियों और ट्रंप की चेतावनियों के परिप्रेक्ष्य में मादुरो को सजग और सन्नद्ध रहना था। क्या वह ट्रंप के अंतिमेत्थम को घ़ड़की मान रहे थे? वह अपनी सुरक्षित मांद में होते तो उन्हें दबोचना मुश्किल था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मादुरो ने सन 2013 में शावेज के उत्तराधिकारी के तौर पर सत्ता संभाली थी, घरेलू और वैदेशिक नीति में वह शावेज के नक्शे पर चले। उन्होंने खुद तेल भंडारों का दोहन करना चाहा, जिन पर वाशिंगटन की अर्से से गिद्ध दृष्टि है। सन 2018 और सन 2024 के आम चुनावों में उन पर ‘वोट चोरी’ के गंभीर आरोप लगे।

अमेरिका और योरोपीय देशों समेत घरेलू विपक्ष ने माना कि मादुरो चुनावी धांधली से फिर से सत्ता में आये हैं। अमेरिका ने उन पर खुल्लमखुल्ला नारको-टेररिज्म का आरोप लगाया और कहा कि मादुरो ड्रग कार्टेल का संचालन कर रहे हैं। कार्टेल डेलॉस सोल्स के संचालन और अन्य आरोपों से बिंधे मादुरो को असफल कू-दे-ता, विरोध प्रदर्शनों, धांधली के आरोपों, आर्थिक पाबंदियों आदि का सामना करना पड़ा। इस बीच वेनेजुएला में मुद्रा स्फीति की दर, मंहगाई और गरीबी बढ़ती गयी। जब-तब तेल निर्यात से उसे राहत मिली। वह तेल की बदौलत भयावह संकट से उबर भी जाता, लेकिन ट्रंप ने मादुरो की मुश्कें कसने की कसम खा रखी थी।

अमेरिका ने रणनीति के तहत एंटी-ड्रग्स मुहीम छेड़ी, शैडो-फ्लीट पर पाबंदी लगा दी, तीस नौकायें नष्ट कर दीं और बंदरगाहों की नाकाबंदी कर दी। मादुरो पर पहले 15 मिलियन डालर का ईनाम था, जो ट्रंप के पुन: सत्ता में आने पर 25 मिलियन डॉलर और हाल में बढ़ाकर 50 मिलियन डॉलर कर दिया गया। यह एक बड़ी रकम है। इसके लोभ में लगता है कि मादुरो के प्रहरी और अंगरक्षक उनका साथ छोड़ गये। अंतत: उनका हश्र भी कर्नल गद्दाफी और सद्दाम हुसैन सरीखा हुआ। वह जीते जी दुश्मन के हाथ लग गये।

दो करोड़ 85 लाख की आबादी का वेनेजुएला खनिज और तेल समृद्ध लातिनी अमेरिकी राष्ट्र है। तेल के अथाह भंडार के अलावा वहां लोहा, कोयले, सोने, हीरे और निकिल के बड़े भंडार है। पूर्व गुआना, ब्राजील और कोलंबिया से घिरे वेनेजुएला एंजेल समेत असंख्य सुंदर प्रपातों, वर्षा वन, सुरम्य उद्यानों, कदाटुंबा में बिजली उत्पादन और मेरिडा में सर्वोच्च केबल कार के लिये जाना जाता है। सन 2025 के लिये शांति का नोबेल पुरस्कार भी यहां की मारिया कोरिना मचाडो को मिला। ट्रंप इस पुरस्कार के प्रबंल दावेदार थे, लेकिन मचाडो ने उन्हें पछाड़कर बाजी मार ली। मचाडो मादुरो की प्रबल विरोधी हैं और उन्होंने अमेरिका से सैन्य हस्तक्षेप की बात भी की थी। नोबेल पुरस्कार के लिये वह बाहरी मदद से चुपचाप चोरी छिपे वेनेजुएला से निकलकर ओस्लो पहुंच गयी बताई जाती है।

इस बात में शक नहीं कि शेखीखोर ट्रंप के तेवर तीखे हैं। मादुरो को सबक सिखाने के बाद उनकी घुड़कियों का महत्व बढ़ गया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वेनेजुएला में वही होगा, जो वह चाहेंगे। वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक उपराष्ट्रपति सुश्री डेल्सी रोड्रिगेज अंतरिम राष्ट्रपति होंगी, लेकिन ट्रंप ने सुरक्षित, सही और न्यायपूर्ण सत्ता हस्तांतरण तक सत्ता हाथ में रखने की बात कही है। यानि अब संसाधन समृद्ध वेनेजुएला संयुक्त राज्य अमेरिका का उपनिवेश है। अमेरिका की विराट तेल कंपनियां वेनेजुएला में तेल उलीचेंगी और अनापशनाप मुनाफा बटोरेंगी।

ट्रंप ने सेक्रेट्री ऑफ स्टेट मार्को रूबियो की डेल्सी रोड्रिगेज से बातचीत पर संतोष व्यक्त किया है। ट्रंप की दिक्कत यह है कि उनके देश में ही उनका विरोध हो रहा है। न्यूयार्क के मेयर ममदानी ने इस आक्रामक कार्रवाई का खुला विरोध किया है। रूस, चीन, ब्राजील, ईरान, क्यूबा, स्पेन, बेलिविया, चीले और कोलंबिया ने ट्रंप की निंदा की है, जबकि भारत ने पक्ष-विपक्ष में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। समूचे विश्व में इसे दादागिरी और अंतराष्ट्रीय नियमों और राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन माना जा रहा है। इसमें शक नहीं कि चीले, बोलीविया, डोमीनिकन रिपब्लिकन, इक्वेडोर, ग्वाटेमाला, हैती, मेक्सिको, पनामा और निकारागुआ में हस्तक्षेप और तख्तापलट के बाद उसकी दाढ़ से खून लग गया है। अब सबकी नजर यूं तो पांच जनवरी को सुरक्षा परिषद की बैठक पर है, अलबत्ता यह सच है कि वेनेजुएला का प्रसंग खूँखार अमेरिकी नव-उपनिवेशवाद की ताजा कड़ी है।

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