UP में दलित वोटों की जंग! कांशीराम की विरासत पर बसपा और सपा आमने-सामने!

UP Election Dalit Vote Politics: उत्तर प्रदेश में व‍िधानसभा चुनाव से पहले दल‍ित वोट बैंक पर सेंध लगाने की तैयारी है.इसको लेकर तमाम दल कार्यक्रम से लेकर जनसभा और लोगों तक पहुंच रहे हैं.
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मायावती और अख‍िलेश यादव

UP Election Dalit Vote Battle: उत्तर प्रदेश में अगले साल यानी कि 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इन चुनावों को लेकर तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी कमर अभी से ही कस ली है. यही वजह है कि ज्यादातर दलों के नेता मैदान में नजर आने लगे हैं. इन सब में सबसे ज्यादा खास और हर किसी की नजर दल‍ित वोट बैंक पर हैं. यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) दोनों ही दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हैं.

बसपा संस्थापक कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि के मौके पर प्रदेश भर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इन कड़ी में सपा और बसपा दोनों पार्टियों के अलग-अलग कार्यक्रमों ने इस राजनीतिक मुकाबले को और चर्चा में ला दिया है.

लखनऊ में बसपा का शक्ति प्रदर्शन

बसपा ने कांशीराम की पुण्यतिथि पर राजधानी लखनऊ के इको गार्डन स्थित कांशीराम स्मारक स्थल पर कार्यक्रम की तैयारी की है. पार्टी की कोशिश है कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों से अधिक से अधिक कार्यकर्ता और समर्थक जुटे. इसके जरिए बसपा अपने पुराने वोट बैंक और संगठन की ताकत दिखाना चाहती है.

पार्टी प्रमुख मायावती ने कांशीराम को श्रद्धांजलि देते हुए उनके विचारों और संघर्ष को याद किया. उन्होंने कहा कि कांशीराम ने दलितों, पिछड़ों और समाज के कमजोर वर्गों को राजनीतिक ताकत दिलाने के लिए काम किया. बसपा के लिए यह कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है. पार्टी के सामने अपना घटता जनाधार मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने की चुनौती भी है.

अंबेडकर नगर से सपा का संदेश

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी भी दलित मतदाताओं के बीच अपनी जगह बढ़ाने की कोशिश कर रही है. कांशीराम की पुण्यतिथि पर सपा सांसद धर्मेंद्र यादव का अंबेडकर नगर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे, जो इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

अंबेडकर नगर दलित आबादी वाला महत्वपूर्ण जिला है. इसे मायावती के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान 1995 में बनाया गया था. ऐसे में यहां सपा का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है.

अखिलेश यादव की पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA के समीकरण के जरिए विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़ने पर जोर दे रही है. सपा की कोशिश है कि दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल कर आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत की जाए.

कांशीराम की विरासत पर किसका दावा?

कांशीराम ने दलित समाज को संगठित कर राजनीति में उसकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने बामसेफ जैसे संगठन के जरिए सामाजिक जागरूकता और बहुजन समाज की एकजुटता पर जोर दिया. बाद में बहुजन समाज पार्टी के गठन के साथ यह आंदोलन चुनावी राजनीति में भी मजबूत हुआ.

अब सवाल है कि कांशीराम की विरासत और दलित समाज का भरोसा किस पार्टी को कितना फायदा पहुंचाएगा? बसपा अपने पुराने आधार को वापस पाने की कोशिश में है, जबकि सपा PDA के जरिए नए सामाजिक समीकरण बनाने में जुटी है.

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