सफेद पत्थर की ‘काली हकीकत’… 7 KM में 55 चूना पत्थर खदानें, मुनाफे के शोर में 14 गांवों में सांस लेना तक है मुश्किल

Durg News: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में विकास की बुनियाद कही जाने वाली चूना पत्थर की खदानें अब जिले के लिए अभिशाप बनती जा रही हैं. यहां 7 KM के दायरे में 55 चूना पत्थर खदानें और करीब 12 क्रेशर हैं, जिस वजह से प्रभावित 14 गांवों में सांस तक लेना मुश्किल हो गया है.
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चूना खदान (फाइल इमेज)

Durg News: विकास की बुनियाद कहे जाने वाले चूना पत्थर की खदानें आज दुर्ग जिले के कई गांवों के लिए अभिशाप बनती जा रही हैं. सेलूद, चुनकट्टा, मुड़पार, पतोरा, ढौर और पेंड़ी जैसे में गांवों में सीमेंट, स्टील और निर्माण उद्योग को ईंधन देने वाला यह खनिज स्थानीय जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है. बाजार में कीमतें बढ़ने से खनन कंपनियों का मुनाफा तो बढ़ा है, लेकिन गांवों में सांस लेना तक मुश्किल होता जा रहा है. सेलूद- मुड़पार, चुनकट्टा क्षेत्र, जो कभी हरियाली और समृद्ध खेती के लिए जाना जाता था, आज महज 5 से 7 किलोमीटर के दायरे में 55 से अधिक चूना पत्थर खदानों और करीब 12 क्रेशरों से घिर चुका है. इसके अलावा 8 से 10 नई खदानों की स्वीकृति की तैयारी चल रही है.

साथ में नाक की दवाई लेकर चलते हैं ग्रामीण

जब विस्तार न्यूज इन प्रभावित गांवों में से एक मुड़पार गांव में पहुंचा तो ग्रामीण अपनी समस्या बताने के लिए पहुंच गए. लोगों ने कई तरह की समस्याएं बताई, जैसे की ब्लास्टिंग की वजह से घरों में दरार आना. क्रेशर से इतनी धूल है कि घर पूरे के पूरे धूल की चादर से ढंक गए हैं. उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है. यहां तक की लोग अपनी जेब में नाक में डालने वाली दवाई लेकर घूमते हैं. अगर वह दवाई नहीं डालेंगे तो वह सांस नहीं ले पाएंगे. यहां रहने वाले ग्रामीणों को फेफड़ों की बीमारी ङी हो रही है.

खेतों में गिरते हैं बड़े-बड़े पत्थर

ग्रामीणों के खेत पर पहुंची विस्तार न्यूज की टीम को लोगों ने बताया कि उनके खेत के बगल में ही एक गिट्टी का खदान है, जिसकी वजह से आए दिन वहां हैवी ब्लास्टिंग होती है. बड़े-बड़े पत्थर उड़ कर उनके खेतों में गिरते हैं. सभी जान जोखिम में डालकर अपने खेत पहुंचते हैं और काम करते हैं. लेकिन उन्हें डर रहता है कि कहीं भी से भी एक पत्थर उनके ऊपर आकर गिर गया तो उनका क्या होगा.

ग्रामीणों ने बताया कि किस तरह से खदानों में ब्लास्टिंग की वजह से उनके खेतों में पत्थर उड़ कर आते हैं. खेतों से पत्थर हटाने के लिए खेत के मालिक को ही खदान संचालकों ने पत्थर हटाने के एवज में पैसे देने की बात कही है. महिलाएं अपने ही खेत में रहकर खदान से गिरे पत्थर हटाती हैं.

पेड़-पत्ते भी हुए सफेद

इन क्षेत्रों में कई चूना पत्थर और क्रेशर की खदाने हैं. इससे निकलने वाली धूल की परत हर जगह धूल उड़ाती रहती है. यहां तक कि यहां पर लगे पेड़-पौधे के हरे पत्ते अब सफेद पड़ गए हैं. हर पेड़ के ऊपर सफेद धूल जमी रहती है. इस धूल की वजह से किसानों की फसल भी बर्बाद हो रही है.

सरकारी स्कूल भी प्रभावित

मुड़पार गांव में एक शासकीय स्कूल भी है. वह स्कूल भी खदानों से निकलने वाले धूल और खदानों में होने वाले ब्लास्टिंग से अछूता नहीं है. स्कूल में नन्हे-नन्हे बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन स्कूल की दीवारों में भी ब्लास्टिंग की वजह से दरार आ गई है. हमेशा डर बना रहता है की कब ब्लास्टिंग से स्कूल गिर जाए. जब भी ब्लास्टिंग होती है स्कूल के दरवाजे और खिड़कियां हिलने लगती हैं. स्कूल में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों ने बताया कि जब भी ब्लास्ट होता है तो खिड़की और दरवाजे हिलने लगते हैं.

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इधर सिस्टम में बैठे अधिकारी खानापूर्ति करने में कहीं भी नहीं चूकते हैं. दुर्ग जिले के खनिज अधिकारी दीपाक मिश्रा का इस मामले में कहना है कि कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत मिली थी. इसके बाद हमने कई खदानों की जांच की, जिनमें से कुछ खदानों को सील किया गया है. जांच जारी है. जहां भी कामियां मिलेगी हम वहां कार्रवाई करेंगे.

एक नजर आंकड़ों पर

  • जिले में चूना पत्थर की खदानें – 123
  • सेलूद क्षेत्र में खदानों की संख्या – 55
  • खदानों से कितने गांव प्रभावित – 14+
  • इनसे प्रभावित जनसंख्या – 25-30 हजार
  • खदान में ब्लास्टिंग से दरकने लगे हैं मकान

कुएं और हैंडपंप तक क्षतिग्रस्त

खनन में ब्लास्टिंग से कई मकानों में दरारें पड़ चुकी हैं. कुएं और हैंडपंप क्षतिग्रस्त हो गए हैं. वहीं, ब्लास्टिंग के समय बच्चों और महिलाओं में भय का माहौल बन जाता है. मुड़पार में सरकारी स्कूलों में तक में दरारें आ चुकी हैं.

खदानों की वजह से जलस्रोत भी सूखे

खदानों के कारण भू-जल स्तर तेजी से गिरा है. सालभर पानी उपलब्ध रहता था अब तालाब सूख रहे हैं और खेती पर सीधा असर पड़ा है. पतोरा, चुनकट्टा, मुड़पार और ढौर में खेती आधी खत्म हो चुकी है. ब्लास्टिंग की वजह से किसानों के खेतों में बड़े-बड़े पत्थर जाकर गिरते है, जिसकी वजह से किसानों को खेती करने में भी बहुत मुश्किल होती है. जान जोखिम में डालकर bu खेत में जाते हैं लेकिन उन्हें डर रहता है कि कहीं से भी बड़े पत्थर आकर उनके ऊपर न गिर जाए.

कानून में क्या होना चाहिए और जमीनी सच क्या है?

1 – धूल नियंत्रण अनिवार्य, लेकिन गांव धूल से ढके

2 – जलस्रोत संरक्षण का प्रावधान, फिर भी हैंडपंप सूख रहे

3 – सीमित ब्लास्टिंग के नियम, पर घरों में दरारें

4 – फेंसिंग अनिवार्य, फिर भी खुले गड्‌ढों में हादसे

5 – पुनर्भरण का नियम, पर दर्जनों खदानें खुली पड़ी

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