Ambikapur: निजी स्कूलों की मनमानी के आगे शिक्षा विभाग बेबस? कागजो में लगा जुर्माना, तीन माह बाद भी नहीं हुई वसूली
जिला शिक्षा अधिकारी, अंबिकापुर
Ambikapur: सरगुजा जिले में निजी स्कूलों की मनमानी को लेकर एक बार फिर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है. निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाने के आरोप में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने कुछ निजी स्कूलों पर जुर्माना लगाया था, लेकिन कार्रवाई यहीं तक सीमित रह गई. करीब तीन महीने बीत जाने के बाद भी विभाग जुर्माने की राशि वसूल नहीं कर सका है. इस बीच संबंधित स्कूलों को राहत मिलने से अभिभावकों में नाराजगी बढ़ गई है.
नियमों के उल्लंघन की पुष्टि
अभिभावकों का कहना है कि जब शिक्षा विभाग ने स्वयं नियमों के उल्लंघन की पुष्टि करते हुए स्कूलों पर जुर्माना लगाया था, तो अब तक उसकी वसूली क्यों नहीं हुई. उनका आरोप है कि विभाग ने स्कूलों को अप्रत्यक्ष रूप से क्लीनचिट दे दी है, जिससे कार्रवाई की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं.
मामले में एक और बड़ी समस्या सामने आई है. शिक्षा विभाग के निर्देशों के बाद अब अभिभावक अपने बच्चों के लिए एनसीईआरटी की किताबें खरीद रहे हैं, लेकिन पहले निजी प्रकाशकों की जो किताबें उन्होंने मजबूरी में खरीदी थीं, उन्हें स्कूल प्रबंधन वापस नहीं करा रहा है. इससे अभिभावकों पर दोहरी आर्थिक मार पड़ रही है.
अभिभावकों का कहना है कि यदि प्रशासन समय पर हस्तक्षेप करता और निजी स्कूलों को निजी प्रकाशकों की किताबें वापस कराने के निर्देश देता, तो उन्हें आर्थिक नुकसान नहीं उठाना पड़ता. उनका आरोप है कि जिला प्रशासन भी इस मामले में प्रभावी पहल करता नजर नहीं आ रहा है.
जिला शिक्षा अधिकारी ने रखा अपना पक्ष
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी दिनेश झा ने सरकारी प्रक्रिया का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा है. अभिभावक और समाजसेवी शिल्पा पांडे ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए दोषी स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और अभिभावकों को राहत दिलाने की मांग की है.
अभिभावकों के साथ बैठक
दूसरी तरफ अप्रैल महीने में जिला प्रशासन और जिला शिक्षा अधिकारी की टीम ने अलग-अलग स्कूलों में अभिभावकों के साथ बैठक किया था. इस दौरान स्कूलों की मनमानी सामने आई थी, तब जिला प्रशासन और जिला शिक्षा अधिकारी की टीम ने ओरिएंटल पब्लिक स्कूल, कार्मेल स्कूल, बिरला ओपन माइंड स्कूल के अलावा मोन फोर्ट स्कूल पर बड़ा जुर्माना लगाया था. तब लोगों ने जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यवाही की जमकर तारीफ की थी लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यवाही की अब हवा निकल चुकी है.
मतलब साफ है कि स्कूलों के दबाव के आगे जिला प्रशासन के अधिकारी झुक गए और स्कूलों की मनमानी के खिलाफ कार्यवाही नहीं हो सकी. हालांकि कार्रवाई नहीं होने के पीछे जिला शिक्षा अधिकारी का तर्क है कि स्कूलों में अभिभावकों की एक समिति है और इस समिति ने लिख कर दिया है कि प्राइवेट पब्लिकेशंस की किताब पढ़ाने पर उन्हें कोई परेशानी नहीं है और इसी वजह से कार्यवाही नहीं कर रहे हैं जबकि हैरानी की बात यह है कि समिति में स्कूल के कुछ गिने-चुने अभिभावक ही शामिल होते हैं और निजी स्कूलों के संचालकों के द्वारा समिति में शामिल अभिभावकों पर अघोषित तरीके से दबाव बनाया जाता है और ऐसी स्थिति बनती है.
वसूली क्यों नहीं हो सकी?
अब बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग ने नियमों के उल्लंघन को स्वीकार करते हुए जुर्माना लगाया था, तो तीन महीने बाद भी उसकी वसूली क्यों नहीं हो सकी? और जिन अभिभावकों ने निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदीं, उनके आर्थिक नुकसान की भरपाई आखिर कौन करेगा? यही सवाल अब अभिभावकों के साथ-साथ पूरे शिक्षा तंत्र पर खड़े हो रहे हैं.
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