‘नौकरी गई, परिवार बिखरा, 15 साल तक चला संघर्ष…’, हाईकोर्ट से एयर इंडिया के पायलट को बड़ी राहत

Jitendra Krishna Verma: पायलट जितेंद्र वर्मा को नौकरी, घर और बच्चों से एक आरोप की वजह से दूर होना पड़ा है. इस आरोप के खिलाफ उन्‍होंने 15 साल लड़ाई लड़ी और अब जाकर उनके पक्ष में फैसला आया है.
पायलट जितेंद्र वर्मा

पायलट जितेंद्र वर्मा

Pilot Jitendra Krishna Verma: देशभर से कई ऐसे मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं, जिनमें एक आरोप के कारण किसी की पूरी जिंदगी एक पल में पलट जाया करती है. ऐसा ही कुछ जीतेंद्र कृष्ण वर्मा के साथ हुआ था. करीब डेढ़ दशक तक अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद एयर इंडिया के  पायलट जीतेंद्र कृष्ण वर्मा को बड़ी राहत मिली है.

बॉम्‍बे हाईकोर्ट ने उनके फ्लाइंग लाइसेंस को सस्पेंड करने के आदेश को रद्द कर दिया है.  नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) की कार्रवाई पर सवाल भी खड़े किए हैं. जीतेंद्र ने बताया कि इन 15 वर्षों में उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने में 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए.

जितेंद्र कृष्ण वर्मा आज 61 साल की उम्र पार कर चुके हैं.  एक समय वे एयर इंडिया के सबसे एक्‍सपर्ट पायलटों में गिने जाते थे. कंपनी के बेड़े में शामिल सभी प्रमुख विमानों को उड़ाने की योग्यता रखते थे. लेकिन 2011 में एक कथित फर्जी मार्कशीट मामले में उनका लाइसेंस अचानक निलंबित कर दिया गया, जिसके बाद उनकी पूरी जिंदगी बदल गई.

एक फैसले ने बदल दी जिंदगी

लाइसेंस निलंबित होने के बाद वर्मा की नौकरी चली गई.  उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित हुआ. उन्होंने दावा किया कि उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा, वैवाहिक संबंध टूट गए और बच्चों से भी दूरी बन गई. बीते 15 सालों से वह अपने बच्चों से नहीं मिल पाए हैं. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कुछ समय गुजरात में अपने पिता के घर पर भी रहना पड़ा है.  

उनका कहना है कि इस लंबे संघर्ष में परिवार और करीबी दोस्तों ने उनका साथ दिया, वरना हालात और मुश्किल हो सकते थे. उन्होंने कानूनी लड़ाई में लाखों रुपये खर्च किए और वर्षों तक अपने सम्मान और करियर को वापस पाने के लिए संघर्ष किया.  

आखिर मामला क्या था?

मार्च 2011 में दिल्ली पुलिस ने कुछ पायलटों के फ्लाइंग लाइसेंस जारी करने में कथित अनियमितताओं की जांच शुरू की थी. इसी दौरान जीतेंद्र वर्मा पर आरोप लगा कि उन्होंने लाइसेंस हासिल करने के लिए फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया. उन्हें गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन कुछ ही दिनों में जमानत मिल गई.

इसके बाद DGCA ने उनका एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (ATPL) निलंबित कर दिया. वर्मा का आरोप था कि उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिए बिना यह कार्रवाई की गई.  

अदालत ने क्यों दी राहत?

हाईकोर्ट ने पाया कि लाइसेंस निलंबित करने से पहले न तो वर्मा को कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया. अदालत ने यह भी कहा कि 15 साल बीत जाने के बावजूद उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए हैं और जिस कथित फर्जी मार्कशीट के आधार पर कार्रवाई की गई, उसे भी स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया.

अदालत ने माना कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और DGCA अपने फैसले का उचित आधार बताने में विफल रहा है. इसी कारण निलंबन आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया गया. हालांकि अदालत ने मामले को दोबारा DGCA के पास भेजा है ताकि वह वर्मा को सुनवाई का अवसर देकर नया फैसला ले सके.  

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