Bihar Politics: पूर्णिया-भागलपुर नहीं, गोपालगंज से ही भाजपा ने क्यों फूंका चुनावी बिगुल?
नीतीश कुमार और अमित शाह
Bihar Politics: इस साल के अंत में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में चुनावी साल में कोई भी राजनीतिक दल बिना किसी रणनीति के कोई काम नहीं करता दिख रहा है. एक तरफ राजद नेता तेजस्वी यादव लोकसभा और 2020 के विधानसभा में अपना दमख़म दिखा चुके हैं. ऐसे में भाजपा कहीं से भी चूक करने के मूड में नहीं है. बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में 2027 में चुनाव है और बीजेपी भी कम दबाव नहीं होगा.
बिहार में NDA के नेता व सीएम नीतीश कुमार हमेशा बीजेपी के लिए बड़े भाई की भूमिका में रहे हैं. नीतीश कुमार के नाम पर ही बीजेपी वहां चुनाव लड़ती आई है. लेकिन अंदरखाने से खबर है कि इस बार बीजेपी अपने ‘बड़े भाई’ को आराम करने की सलाह दे सकती है और खुद चुनाव की कमान अपने हाथ में ले सकती है. इसके संकेत आपको गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बिहार दौरे से मिल सकते हैं.
अमित शाह से पहले पीएम मोदी जा चुके हैं और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी बिहार में बैठकें कर चुके हैं. पहले के चुनावों में इसकी सारी कमान नीतीश कुमार के हाथों में होती थी और वह बीजेपी को जो लिस्ट भेजते थे उसी पर आखिरी मुहर लगती थी. लेकिन अबकी समीकरण बदले नजर आ रहे हैं. इस बार बीजेपी सर्वे कराकर ही टिकट देगी और ना सिर्फ बीजेपी अपने नेताओ के लिए सर्वे कराएगी बल्कि NDA के सभी घटक दल के लिए सर्वे कराया जाएगा. अमित शाह ने अपने एनडीए के घटक दलों से कैंडिडेट्स के नाम की लिस्ट भी मांगी थी, जिसे रविवार की मीटिंग में उनको सौंप दिया गया. अब सर्वे के बाद फैसला होगा कि कौन सी सीट किसके खाते में जाएगी. यहीं से बिहार की राजनीति में बदलाव का दौर शुरू होता दिखाई दे सकता है और ‘बड़ा भाई’ सहयोगी के तौर पर रह जाएंगे और कमान ‘छोटे भाई’ बीजेपी के हाथों में होगी.
नीतीश के चेहरे पर नहीं लड़ा जायेगा बिहार का चुनाव
बिहार में बीजेपी नीतीश के भरोसे है- ऐसा कई बार आपने नेताओं के मुंह से सुना होगा. लेकिन अंदरखाने में इस बात की सुगबुगाहट है कि पार्टी अन्य राज्यों वाला फॉर्मूला बिहारा में भी अपना सकती है. यानी, इस बार चुनाव जीतने पर बीजेपी का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल सकता है. हालांकि, सार्वजनिक तौर पर इसको लेकर कुछ कहा नहीं जा रहा है, लेकिन जिस तरह अन्य राज्यों में बीजेपी अपने पैर फैला रही है, उसके बाद इसके कयास भी लगने लगे हैं.
दरअसल, नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ने का मतलब है कि जो वर्ग नीतीश से खफा हैं, उनके विरोध का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ेगा और इससे राजद को सीधा फायदा हो सकता है. सीएम नीतीश के दल बदलने से बिहार में खास वर्ग (भूमिहार) काफी नाराज हैं. राजद ने इस वर्ग के नेताओं को राज्यसभा भेजा है. यही वजह है कि इस वर्ग को बीजेपी नजरंअदाज करना नहीं चाहेगी.
पहले बाबा बागेश्वर फिर अमित शाह गोपालगंज में
यूँ तो NDA के लिए चुनावों में हर बार चुनौती पूर्णिया, भागलपुर और गया रहता था. चुनावी बिगुल भी यहीं से फूंका जाता था, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग लग रहा है. लेकिन इस बार बीजेपी का फोकस सारण है और गोपालगंज जिले में ही अमित शाह की रैली हुई. शाह ने इस दौरान लालू-राबड़ी पर जमकर हमला बोला. बता दें कि इससे पहले बाबा बागेश्वर की कथा गोपालगंज में हुई थी, जिसके बाद सियासत गरमाई रही थी. इसे भाजपा की बदली हुई रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
तेजस्वी यादव MY (मुस्लिम-यादव) के भरोसे ही नहीं, बल्कि A टू Z फॉर्मूले पर बढ़ने की बात कर रहे हैं. तेजस्वी यादव ने इस पर काम करना भी शुरू कर दिया है. तेजस्वी यादव ने तय किया है कोई कितना भी पुराना कद्दावर नेता हो, टिकट काटने की नौबत आई तो उनका टिकट कटेगा और वहां से जो कैंडिडेट बेहतर स्थिति में होगा, उसकी ही दावेदारी बनेगी. ऐसे में गोपालगंज सदर और बरौली में राजपूत वोटर ज्यादा हैं और एनडीए के वर्तमान विधायक भी राजपूत बिरादरी से ही हैं, तो राजद राजपूत कैंडिडेट को टिकट दे सकती है. इसी तरह कुचायकोट में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर राजद मुकाबले को रोचक बना सकती है.
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इस बार के चुनाव में NDA के सामने चुनौती अपने जनाधार को बचाना है और ज्यादा से ज्यादा सीट लाना है. वहीं तेजस्वी का टारगेट बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाना है. चाहे जातीय फैक्टर हो या योजनाओं का ऐलान. इस रणनीति से तेजस्वी यादव बिहार में एनडीए को सत्ता से बेदखल करने का प्लान बना रहे हैं.
अमित शाह ने गोपालगंज में लालू-राबड़ी के जंगलराज का तो खूब जिक्र किया, लेकिन उनके विकास के डेटा में एक भी शब्द उस क्षेत्र के लिए नहीं निकला, जहां वो आये थे. गोपालगंज और चम्पारण अदद एक पूल के लिए तरस रहा है. पिछले 18 वर्षों से बन रहे डुमरिया घाट ब्रिज का काम अभी तक पूरा नहीं होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी रहती है. साथ ही भय भी बना रहता है कि कहीं कोई हादसा न हो जाए. पूर्व में बिहार में ऐसे अनगिनत पुल ध्वस्त हुए हैं. ऐसे में लोगों की मांग है कि उनके इलाके में पुल का निर्माण जल्द से जल्द हो.