मुस्लिम वोटों का ‘मायाजाल’…सीमांचल कैसे बना बिहार का हॉट बैटलफील्ड?
प्रतीकात्मक तस्वीर
Bihar Election: बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं, और इस बार सारी निगाहें सीमांचल पर टिकी हैं. किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जैसे जिलों वाला यह इलाका, जो कभी सिर्फ बाढ़ और पिछड़ेपन की खबरों में रहता था, अब बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन गया है. 24 विधानसभा सीटों वाला यह क्षेत्र अपनी विशाल मुस्लिम आबादी (39% से 68%) के चलते हर राजनीतिक दल के लिए ‘करो या मरो’ की जंग का मैदान बन चुका है. लेकिन आखिर ऐसा क्या है कि सीमांचल आज बिहार की सियासत का केंद्र बिंदु बना हुआ है? आइए विस्तार से जानते हैं.
सत्ता की कुंजी मुस्लिम वोट बैंक
सीमांचल की सबसे बड़ी ताकत है इसकी मुस्लिम आबादी, जो किसी भी पार्टी के लिए सत्ता का रास्ता तय कर सकती है. 2020 के विधानसभा चुनाव में यहां के मुस्लिम मतदाताओं ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को 5 सीटें (अमौर, कोचाधामन, जोकीहाट, बायसी, बहादुरगंज) जिताकर सबको चौंका दिया था. हालांकि, बाद में चार विधायक RJD में चले गए, लेकिन ओवैसी ने साबित कर दिया कि सीमांचल में मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की ताकत उनकी पार्टी में है. इस बार भी AIMIM इसी रणनीति के साथ मैदान में है, जिससे RJD, कांग्रेस और JDU की नींद उड़ी हुई है. दूसरी ओर, बीजेपी और JDU गठबंधन (NDA) भी विकास के वादों के साथ इस वोट बैंक को लुभाने की कोशिश में जुटा है.
नीतीश का ‘विकास कार्ड’ और ओवैसी का ‘मुस्लिम कार्ड’
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीमांचल में बाढ़ राहत, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर काम करके अपनी पकड़ मजबूत की है. पिछले दिनों JDU ने ‘अंबेडकर रथ’ और ‘अल्पसंख्यक विकास रथ’ जैसे अभियानों के जरिए दलित और मुस्लिम वोटरों को साधने की कोशिश शुरू की थी. लेकिन ओवैसी का फोकस साफ है—मुस्लिम पहचान और प्रतिनिधित्व. उनकी सभाओं में विकास से ज्यादा मुस्लिम समुदाय की उपेक्षा का मुद्दा छाया रहता है, जो युवा वोटरों को आकर्षित कर सकता है.
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बीजेपी की नई चाल, RJD की पुरानी ताकत
बीजेपी इस बार सीमांचल में नए सिरे से समीकरण साध रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में पूर्णिया और किशनगंज में सभाएं कीं और मां सीता के मंदिर बनाने का ऐलान कर हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश की. लेकिन मुस्लिम वोटों के लिए पार्टी अभी भी JDU पर निर्भर दिख रही है. उधर, RJD अपने पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के साथ मैदान में है. तेजस्वी यादव सीमांचल में लगातार रैलियां कर रहे हैं, और उनकी कोशिश है कि ओवैसी उनके वोट बैंक में सेंध न लगा सकें.
पिछले 5 चुनावों में सीमांचल का मिजाज?
2005 में जब बिहार में लालू का जादू फीका पड़ रहा था, सीमांचल की गलियों में RJD का झंडा लहरा रहा था. फरवरी में हुए चुनाव में मुस्लिम-यादव गठजोड़ ने RJD को मजबूत रखा, लेकिन अगले विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार की JDU ने विकास का ढोल पीटना शुरू किया और सीमांचल की कुछ सीटों पर कब्जा जमा लिया. ऊपर से बीजेपी का साथ मिला, तो NDA ने पहली बार इस इलाके में अपनी टांग अड़ा दी. लेकिन सच कहें तो उस वक्त सीमांचल का दिल RJD के लिए ही धड़क रहा था.
फिर आया 2010, जब नीतीश का विकास मॉडल ऐसा चला कि सीमांचल भी उनका दीवाना हो गया. JDU ने मुस्लिम वोटों का एक बड़ा टुकड़ा छीन लिया, और RJD-कांग्रेस को मुंह ताकना पड़ा. 2015 में महागठबंधन ने बाजी पलटी. RJD और JDU साथ आए, तो सीमांचल फिर से इनके रंग में रंग गया. लेकिन असली ट्विस्ट आया 2020 में, जब ओवैसी की AIMIM ने धमाकेदार एंट्री मारी. पांच सीटें—अमौर, कोचाधामन, जोकीहाट, बायसी, बहादुरगंज—सीधे उनके झोली में जा गिरीं. मुस्लिम वोट बंट गए, NDA और महागठबंधन के पसीने छूट गए.
2025 का सस्पेंस
सीमांचल की 24 सीटें बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में भले ही कम लगें, लेकिन इनका असर पूरे राज्य के समीकरण पर पड़ता है. अगर मुस्लिम वोट एकतरफा किसी पार्टी के पक्ष में गए, तो वह सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है. ओवैसी की मौजूदगी ने जहां RJD और कांग्रेस को चुनौती दी है, वहीं नीतीश और बीजेपी के लिए भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. जानकारों का मानना है कि इस बार सीमांचल में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है—NDA, महागठबंधन और AIMIM के बीच.
सीमांचल तय करेगा बिहार का भविष्य
सीमांचल आज सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का पावर सेंटर बन चुका है. यहां के मतदाता जिसे चुनेंगे, वही बिहार की सत्ता पर काबिज होगा. विकास, पहचान और वोट बैंक की इस जंग में कौन जीतेगा, यह तो नवंबर 2025 में पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि सीमांचल की सियासी गर्मी अभी और बढ़ने वाली है.