वक्फ बिल पेश करने से ठीक पहले मोदी सरकार ने किए तीन बड़े बदलाव, इसका होगा सबसे ज्यादा असर!

वक्फ बोर्ड की नजर सिर्फ स्मारकों पर ही नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों की जमीन पर भी थी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और पूर्वोत्तर राज्यों में वक्फ ने वहां की जमीनों को अपनी संपत्ति बताना शुरू कर दिया था. जबलपुर और छिंदवाड़ा जैसे इलाकों में तो स्थानीय आदिवासी भड़क उठे और आंदोलन तक शुरू हो गए.
Waqf Amendment Bill

प्रतीकात्मक तस्वीर

Waqf Amendment Bill: वक्फ बोर्ड के बेलगाम रवैये को काबू करने के लिए सरकार ने कमर कस ली है. संसद में वक्फ (संशोधन) विधेयक पेश करने से ठीक पहले तीन बड़े बदलाव किए गए हैं, जिन्होंने सबको चौंका दिया. ये बदलाव न सिर्फ वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगाएंगे, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों और आदिवासी समुदायों को भी राहत देंगे.

पहला बदलाव: ताजमहल और कुतुब मिनार पर दावा खत्म!

क्या आपने कभी सोचा था कि ताजमहल या कुतुब मिनार जैसी ऐतिहासिक इमारतें वक्फ बोर्ड की संपत्ति बन सकती हैं? जी हां, वक्फ बोर्ड ने ऐसा दावा ठोक दिया था. दिल्ली में हुमायूं का मकबरा, पुराना किला और आगरा का ताजमहल तक उनकी लिस्ट में शामिल हो गए थे. कुल मिलाकर 280 राष्ट्रीय स्मारकों पर वक्फ ने अपना हक जताया था. इससे न सिर्फ प्रशासन में उलझन बढ़ी, बल्कि इन धरोहरों की देखभाल और पर्यटकों की पहुंच पर भी सवाल उठने लगे.

अब नए नियम के तहत सरकार ने साफ कर दिया है कि 1958 के पुरातत्व कानून के तहत संरक्षित कोई भी स्मारक वक्फ की संपत्ति नहीं हो सकता. अगर पहले ऐसा कोई दावा किया गया था, तो वह अब पूरी तरह से रद्द. यानी अब ये स्मारक सिर्फ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के हवाले रहेंगे. ये कदम इसलिए जरूरी था ताकि हमारी ऐतिहासिक धरोहरें सुरक्षित रहें और उन पर कोई गलत दावा न ठोका जा सके.

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दूसरा बदलाव: आदिवासी जमीन पर नहीं चलेगा जोर

वक्फ बोर्ड की नजर सिर्फ स्मारकों पर ही नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों की जमीन पर भी थी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और पूर्वोत्तर राज्यों में वक्फ ने वहां की जमीनों को अपनी संपत्ति बताना शुरू कर दिया था. जबलपुर और छिंदवाड़ा जैसे इलाकों में तो स्थानीय आदिवासी भड़क उठे और आंदोलन तक शुरू हो गए. उनकी जमीन और पहचान पर खतरा मंडराने लगा था. अब संशोधन में साफ शब्दों में कहा गया है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों की जमीन को वक्फ संपत्ति नहीं बनाया जा सकता. उदयपुर के सांसद मन्नालाल रावत ने इसे बड़ी जीत बताया.

तीसरा बदलाव: 45 दिन में फैसला लागू करने का प्रावधान

वक्फ बोर्ड की एक और शिकायत थी कि उनके फैसले जमीन पर लागू ही नहीं हो पाते. चाहे अवैध कब्जा हटाना हो या संपत्ति का प्रबंधन, जिलाधिकारी टालमटोल करते थे. उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ये समस्या बड़ी थी. इससे वक्फ की संपत्तियों का नुकसान हो रहा था. अब सरकार ने जिलाधिकारियों को 45 दिनों की डेडलाइन दे दी है. वक्फ बोर्ड का कोई भी फैसला 45 दिन में लागू करना होगा, वरना जवाबदेही तय होगी. ये कदम वक्फ के कामकाज को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए उठाया गया है, ताकि धार्मिक और सामुदायिक कामों में रुकावट न आए.

क्या है सरकार का मकसद?

इन तीनों बदलावों से सरकार ने साफ संदेश दिया है कि वक्फ कानून को आज के जमाने के हिसाब से ढाला जाएगा. ऐतिहासिक धरोहरों को बचाना, आदिवासियों के हक की रक्षा करना और वक्फ के प्रबंधन में तेजी लाना, ये तीनों लक्ष्य एक साथ हासिल करने की कोशिश है. लोकसभा में 12 घंटे की बहस के बाद ये बिल पास हो गया और अब राज्यसभा की मंजूरी का इंतजार है. हालांकि, ऊपरी सदन से भी हरी झंडी मिलना तय माना जा रहा है. फिर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद ये कानून बन जाएगा. हालांकि, हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी और कुछ मुस्लिम संगठन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहे हैं.

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