MP News: मध्य प्रदेश में पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने वाली सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली एक बार फिर विवादों में है. स्टेट एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (सिया) के बाद अब मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल में अधिकारियों की भूमिका और अधिकारों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. इस बार अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी की कार्यप्रणाली और उनके द्वारा लिए गए फैसले चर्चा में हैं. मामला केवल उनकी ज्वाइनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय मंजूरियों, अधिकारियों की पदोन्नति और तबादलों से जुड़े निर्णयों के अधिकार को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.
इस पूरे मामले में पर्यावरण विशेषज्ञ और वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट अजय दुबे ने मुख्यमंत्री और केंद्रीय स्तर पर शिकायत की है. उन्होंने अनिरुद्ध मुखर्जी की ज्वाइनिंग, कार्यभार और निर्णय लेने के अधिकारों पर आपत्ति जताई है. शिकायत के बाद अब इस मामले में जल्द जांच के आदेश जारी होने की संभावना जताई जा रही है. जांच होने की स्थिति में अनिरुद्ध मुखर्जी के कार्यकाल में लिए गए फैसलों की भी पड़ताल हो सकती है. खासतौर पर पूर्व में दी गई पर्यावरणीय अनुमतियों को लेकर संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया जा सकता है.
नवनीत-उमा माहेश्वरी पर उठे सवाल
पर्यावरण से जुड़ी सरकारी एजेंसियों में विवाद का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले स्टेट एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी यानी सिया की कार्यप्रणाली को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे. सिया के तत्कालीन अध्यक्ष ने तत्कालीन अधिकारियों नवनीत कोठारी और उमा माहेश्वरी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे. इन अधिकारियों की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं. इसके बाद दोनों अधिकारियों के तबादले भी हो गए थे. अब सिया के पुराने विवाद के बाद प्रदूषण नियंत्रण मंडल में नया मामला सामने आने से पर्यावरणीय मंजूरियों से जुड़ी संस्थाओं की कार्यप्रणाली फिर चर्चा में है.
2019 के फैसले के बाद अधिकारों पर सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू वर्ष 2019 में हुआ प्रशासनिक बदलाव है. बताया जाता है कि उस समय राज्य सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण मंडल में अध्यक्ष की नियुक्ति की व्यवस्था में बदलाव करते हुए प्रमुख सचिव पर्यावरण के अध्यक्ष पद को विलोपित कर दिया था. इसके बाद मंडल के अध्यक्ष का पद मुख्यमंत्री के पास रहने की व्यवस्था रही. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मंडल के अध्यक्ष मुख्यमंत्री हैं, तब अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी ने किस प्रशासनिक हैसियत से मंडल में ज्वाइन किया और उन्हें कौन-कौन से अधिकार प्राप्त थे.
17 जून को मिला था पर्यावरण और एप्को का प्रभार
सरकार ने 17 जून 2026 को अनिरुद्ध मुखर्जी को अपर मुख्य सचिव पर्यावरण की जिम्मेदारी सौंपी थी. इसके साथ ही उन्हें एप्को का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था. आदेश में प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष का प्रभार दिए जाने का उल्लेख नहीं था. इसके बावजूद उनके मंडल में ज्वाइन करने और कामकाज संभालने को लेकर प्रशासनिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं. बताया जा रहा है कि मंडल में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने पर्यावरण से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लिए. इनमें पर्यावरणीय मंजूरियों, अधिकारियों की पदोन्नति और तबादलों से जुड़े फैसले शामिल हैं. अब इन निर्णयों के अधिकार और उनकी प्रशासनिक वैधता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.
जांच हुई तो पुराने फैसले भी आएंगे दायरे में
अजय दुबे की शिकायत के बाद अब सरकार की संभावित कार्रवाई पर निगाहें टिकी हैं. जांच होती है तो केवल अनिरुद्ध मुखर्जी की ज्वाइनिंग और अधिकारों की पड़ताल ही नहीं होगी, बल्कि उनके कार्यकाल में दी गई पर्यावरणीय अनुमतियों की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है. सिया में नवनीत कोठारी और उमा माहेश्वरी को लेकर पहले सवाल उठे और उसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन ने दोनों को हटाने का आदेश जारी कर दिया था.
