MP News: बिना हाथों के हौसले की उड़ान! पैरों से ही करते हैं टाइपिंग, सहायक ग्रेड-03 की परीक्षा पास करके बने क्लर्क
संतकुमार मिश्रा(File Photo)
Input- लवकेश सिंह
MP News: हौसला अगर बुलंद हो, तो हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, इंसान उन्हें मात देकर आगे बढ़ ही जाता है. मऊगंज जिले में पदस्थ संतकुमार मिश्रा ने यह साबित कर दिया है कि शारीरिक कमी कभी भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती.
मऊगंज जिले के कृषि विभाग अंतर्गत एसडीओ कार्यालय में पदस्थ संतकुमार मिश्रा (उम्र 36 वर्ष) जन्म से ही बिना हाथों के हैं. इसके बावजूद उन्होंने M.A. तक की शिक्षा प्राप्त की और नवंबर 2016 में सहायक ग्रेड-03 (क्लर्क) के पद पर नियुक्त होकर शासकीय सेवा में प्रवेश किया. उनका यह सफर संघर्ष, संकल्प और साहस की जीवंत मिसाल है.
जहां सोच हार मान ले, वहां हौसला जीत जाता है
जहां कई लोग दोनों हाथ होने के बावजूद काम से जी चुराते नजर आते हैं, वहीं संतकुमार मिश्रा कंप्यूटर टाइपिंग, कलम से लेखन, फाइलों का संधारण और अन्य विभागीय कार्य पूरी कुशलता और जिम्मेदारी के साथ करते हैं. उनकी कार्यक्षमता इस बात का प्रमाण है कि कमजोरी शरीर में नहीं, बल्कि सोच में होती है.
उन्होंने कभी अपनी शारीरिक स्थिति को बहाना नहीं बनाया. न परिस्थितियों से शिकायत की और ना ही व्यवस्था को दोष दिया. उन्होंने सिर्फ अपने हौसले और मेहनत को अपना हथियार बनाया, जिसकी बदौलत आज वे समाज के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. उनकी कहानी दिव्यांगजनों और युवाओं के लिए यह संदेश देती है कि मजबूत इरादों के आगे हर मुश्किल घुटने टेक देती है.
व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
इतने कर्मठ और समर्पित कर्मचारी होने के बावजूद संतकुमार मिश्रा को आज भी कार्यालय आने-जाने के लिए बस और ऑटो का सहारा लेना पड़ता है. प्रशासन द्वारा उनके लिए किसी भी प्रकार की विशेष सुविधा या सहयोग उपलब्ध नहीं कराया गया है, जो प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.
सबसे अहम बात यह है कि कृषि विभाग के इस एसडीओ कार्यालय में वर्तमान में केवल एसडीओ रवि बघेल और सहायक ग्रेड-03 संतकुमार मिश्रा ही पदस्थ हैं. अन्य कर्मचारियों की तैनाती न होने से कार्यालय पर कार्यभार लगातार बढ़ रहा है, जिससे व्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं.
हौसले की मिसाल, सिस्टम के लिए आईना
एक ओर संतकुमार मिश्रा अपने जज्बे से हर दिन एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की उदासीनता साफ दिखाई देती है. प्रश्न यह है कि क्या ऐसे प्रेरणादायक कर्मचारी को न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराना भी सिस्टम के लिए कठिन है? संतकुमार मिश्रा की यह कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के लिए आईना है, जिसे ऐसे कर्मठ, ईमानदार और समर्पित कर्मचारियों से सीख लेने की आवश्यकता है.
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