MP News: एडवोकेट जनरल कार्यालय में नियुक्तियों पर नहीं लागू होगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट
MP News: मध्य प्रदेश में एडवोकेट जनरल और उनके कार्यालय में नियुक्त लॉ ऑफिसर्स की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि एडवोकेट जनरल कार्यालय में नियुक्तियों पर एससी, एसटी या ओबीसी आरक्षण लागू नहीं होता, क्योंकि ये नियुक्तियां सरकारी सेवा नहीं, बल्कि पेशेवर (प्रोफेशनल) अनुबंध के आधार पर होती हैं. गौरतलब है कि एजी जैसे पदों पर आरक्षण की मांग को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था, जिसके बाद हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले का रखा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए एक अहम निर्देश जरूर दिया है. देश की सर्वोच्च अदालत के मुताबिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता, लेकिन ऐसे कार्यालयों में एसटी और महिलाओं की भागीदारी पर राज्य सरकार को विशेष जोर देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया शामिल करने का निर्देश
दरअसल, यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें मांग की गई थी कि मध्य प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 को एडवोकेट जनरल कार्यालय में भी लागू किया जाए और नियुक्तियों में ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए. हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसे बाद में इंट्रा-कोर्ट अपील के जरिए चुनौती दी गई.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण केवल सार्वजनिक सेवाओं और सिविल पोस्ट पर लागू होता है. एडवोकेट जनरल और लॉ ऑफिसर्स न तो किसी सिविल पोस्ट पर नियुक्त होते हैं और न ही राज्य सरकार के कर्मचारी माने जा सकते हैं. अदालत ने कहा कि इनकी भूमिका पूरी तरह पेशेवर है, इनके साथ नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं होता और न ही इन्हें वेतन दिया जाता है. उन्हें केवल पेशेवर शुल्क का भुगतान किया जाता है.
राज्य सरकार मुकदमों के लिए वकीलों की पेशेवर सेवाएं लेती है – कोर्ट
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एडवोकेट जनरल कार्यालय राज्य सरकार का कोई विभाग नहीं है, बल्कि राज्य सरकार अपने मुकदमों की पैरवी के लिए अधिवक्ताओं की पेशेवर सेवाएं लेती है. ऐसे में आरक्षण कानून को यहां लागू नहीं किया जा सकता. इस फैसले को मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों में भी कानूनी नियुक्तियों की प्रक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है.
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