राज्यसभा में एक दूसरे के विरोधी होंगे बाप-बेटा, धनराज नथवानी के टिकट मिलने पर अटकलों की बाढ़
परिमल नथवानी और धनराज नथवानी
Dhanraj Nathwani: भारतीय राजनीति में बाप-बेटे का एक दल के झंडे तले दिखना आम बात हैं. लेकिन, नथवानी परिवार इस बार उलटी तस्वीर पेश कर रहा है. पिता परिमल नथवानी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के समर्थन से पहले से राज्यसभा में हैं. लेकिन, बेटा धनराज परिमल नथवानी अब समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश से उच्च सदन जा रहे हैं. अगर चुनाव के बाद धनराज नथवानी सदस्य बन जाते हैं, तो राज्यसभा में पहली बार एक ही परिवार का बाप-बेटा अलग-अलग खेमों से एक साथ बैठेगा.
समाजवादी पार्टी ने प्रोफेसर राम गोपाल यादव के साथ धनराज नथवानी का नाम घोषित किया. बाक़ायदा अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया गया. लेकिन, नथवानी परिवार का नाम आते ही सियासी गलियारों में अटकलें शुरू हो गईं. सवाल यही है कि नथवानी परिवार में ऐसा क्या है कि एक छोर सत्ता पक्ष से जुड़ा दिखता है, तो दूसरा विपक्ष की सीट पर पहुंच रहा है.
कौन हैं ये दोनों
परिमल नथवानी रिलायंस समूह से लंबे समय से जुड़े उद्योगपति हैं. 2008 में झारखंड से पहली बार राज्यसभा पहुंचे. 2020 में आंध्र प्रदेश से वाईएसआरसीपी के समर्थन से तीसरा कार्यकाल मिला. जून 2026 में चौथी बार झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते. तब एनडीए का समर्थन था और विपक्ष में क्रॉस वोटिंग के आरोप भी लगे. वे गुजरात क्रिकेट प्रशासन और द्वारका की संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं.
बेटा धनराज 5 फरवरी 1986 को मुंबई में जन्मे. लंदन से इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई की. रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट और रिलायंस न्यू एनर्जी के निदेशक बताए जाते हैं. गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं. परिवार को अंबानी परिवार का करीबी माना जाता है और सियासी गलियारे में यही बात लोगों को सबसे ज़्यादा हैरान कर रही हैं. यही एक सिरा है, जो बाप-बेटे के अलग-अलग पार्टियों से संसद पहुँचने से ज़्यादा चौंका रहा है.
अटकलों का बाज़ार गर्म
टिकट के बाद सबसे तेज चर्चा यही है कि अखिलेश यादव ने चार घंटे की मुलाकात के बाद यह नाम फाइनल किया. सूत्रों का दावा है कि धनराज महाराष्ट्र नंबर की गाड़ी से लखनऊ आए थे. कुछ नेताओं का कहना है कि यह “वाइल्ड कार्ड” है. पुराने सपाई तो ऐसे फूंके पड़े हैं कि पूछिए मत. कुछ नपाइयों ने यहाँ तक कह दिया है कि आज की तारीख़ में पार्टी कार्यकर्ता नहीं, कॉरपोरेट के भरोसे ज़्यादा है.
दूसरी और सबसे बड़ी अटकल अंबानी-मोदी-शाह लाइन से जोड़कर चलाई जा रही है. दरअसल, परिमल को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के करीबी बताने वाली खबरें छप चुकी हैं. लिहाज़ा, पूछा जा रहा है कि सपा ने उस परिवार को टिकट क्यों दिया, जिसका एक सिरा सत्ता पक्ष से जुड़ा दिखता है. कांग्रेस खेमे में भी असहजता की बात कही जा रही है, क्योंकि झारखंड में परिमल की पिछली जीत में विपक्ष टूटा था.
तीसरी चर्चा संख्या की है. उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों में भाजपा गठबंधन आठ सीटें पक्की मान रहा है. सपा के पास दो सीटें सुरक्षित बताई जाती हैं. कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि धनराज “दूसरे” नहीं, संभावित तीसरे नाम की तरह देखे जा रहे हैं. यानी क्रॉस वोटिंग या असंतुष्ट भाजपा विधायकों के सहारे एक और सीट का दांव. हालाँकि, यह अभी अटकलबाजी ही है. आधिकारिक पुष्टि किसी पक्ष ने नहीं की.
चौथी गॉसिप पैसे और पहुंच की है. रिलायंस से तीन दशक पुराना नाता, खेल प्रशासन और धार्मिक संस्थाएं. इसी से परिवार को “दोनों ओर दरवाजा रखने वाला” करार दिया जा रहा है. आलोचक कह रहे हैं कि विचारधारा नहीं, इस पूरे खेल में पहुंच काम आई. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि राजनीतिक दलों के लिए फ़ाइनैंस एक बड़ा मुद्दा है, लिहाज़ा सपा चंदे की झोली भरने के लिए यदि कदम उठाती है, तो यह उसकी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है.
कुल मिलाकर संसद में पिता-पुत्र एक दल से पहले भी रहे हैं. अलग दलों में भी परिवार भी बिखरे हैं. लेकिन राज्यसभा में एक साथ पिता एनडीए समर्थित सांसद और पुत्र सपा सांसद, यह संयोजन नया होने वाला है. एक सदन में एक परिवार के दो सदस्य, दो विरोधी बेंच. वोटिंग, बहस और लॉबिंग के समय यह तस्वीर और तीखी दिखेगी. कुल मिलाकर यह समीकरण काफ़ी इंटरेस्टिंग रहने वाला है.
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