मिसिंग पर्सन में MP देश में नंबर-1, 60 हजार लोग अभी भी लापता, उमंग सिंगार ने सरकार पर हमला बोला

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2023 के बीच प्रदेश में कुल 1.53 लाख मिसिंग केस दर्ज हुए. हर साल की शुरुआत में चलाए जाने वाले 'ऑपरेशन मुस्कान' जैसे अभियानों के बावजूद मामलों की संख्या लगातार बढ़ती गई.
Madhya Pradesh has become number one in the country in terms of missing persons.

मिसिंग पर्सन के मामले में मध्य प्रदेश देश में नंबर एक बन गया है.

MP News: मध्य प्रदेश अब देश में मिसिंग पर्सन के मामलों में पहले स्थान पर पहुंच गया है. संसद के मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2020 में प्रदेश में जहां 48 हजार मिसिंग थे, वहीं 2023 तक यह संख्या बढ़कर 60 हजार हो गई है. इसी के साथ मध्य प्रदेश ने पश्चिम बंगाल को पीछे छोड़ दिया है, जो 2020 में 52 हजार मामलों के साथ पहले स्थान पर था.

44 हजार महिलाएं और बच्चे शामिल

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन 60 हजार मामलों में करीब 44 हजार महिलाएं और बच्चे शामिल हैं. इनमें 39 हजार वयस्क महिलाएं, 3,725 नाबालिग लड़कियां और 1,110 नाबालिग लड़के अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. आंकड़े साफ बताते हैं कि मध्य प्रदेश में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर हालात बेहद गंभीर हैं. लापता हुए हर तीन लोगों में से दो महिलाएं और बच्चे हैं, जिन्हें खोजने में पुलिस पूरी तरह नाकाम साबित हुई है.

तीन साल में 1.53 लाख मिसिंग केस

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2023 के बीच प्रदेश में कुल 1.53 लाख मिसिंग केस दर्ज हुए. हर साल की शुरुआत में चलाए जाने वाले ‘ऑपरेशन मुस्कान’ जैसे अभियानों के बावजूद मामलों की संख्या लगातार बढ़ती गई.

CAG रिपोर्ट ने खोली पुलिस की पोल

कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश पुलिस 25–30 फीसदी कम क्षमता पर काम कर रही है.

  • थानों में 35–40% पद खाली
  • कर्मचारियों पर असहनीय कार्यभार
  • आधुनिक तकनीक और संसाधनों की भारी कमी
    इन हालातों में गंभीर अपराधों और मिसिंग मामलों की प्रभावी जांच पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं.

नेता प्रतिपक्ष ने सरकार पर उठाए सवाल

वहीं मध्य प्रदेश में लापता लोगों की संख्या बढ़ने पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने सरकार पर हमला बोला है. उमंग सिंगार कहा कि ने लगातार बढ़ते मिसिंग पर्सन मामले मध्य प्रदेश सरकार की कानून-व्यवस्था और पुलिस तंत्र पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं. सवाल यह है कि जब पुलिस ही संसाधनों और स्टाफ की कमी से जूझ रही है, तो महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

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