Gwalior: ‘काम बहुत था…’, हाई कोर्ट के फाइल दबाए रखने वाले सवाल पर चीफ इंजीनियर ने दिया जवाब
MP ग्वालियर हाई कोर्ट(File Photo)
Gwalior News: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक मामले में सख्ती दिखाई है. लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग की एक फाइल दो महीने तक लंबित रखने के मामले में खंडपीठ ने मुख्य अभियंता वीके छारी के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत ने पूछा कि फाइल इतने लंबे समय तक क्यों रोकी गई? इस पर मुख्य अभियंता ने जवाब दिया कि उनके पास कार्यभार अधिक था.
जवाब से असंतुष्ट अदालत ने कहा कि यदि कोई अधिकारी काम के दबाव के कारण अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पा रहा है तो सरकार को यह विचार करना चाहिए कि उसे ऐसे पद पर बनाए रखना उचित है या नहीं. इसके साथ ही 327 और 330 दिन की देरी से दायर राज्य सरकार की दोनों रिट अपीलों को खारिज कर दिया गया.
अधिकारियों पर व्यक्तिगत कॉस्ट
खंडपीठ ने अधीक्षण यंत्री आरके सिंह और मुख्य अभियंता वीके छारी पर 25-25 हजार रुपये की व्यक्तिगत कॉस्ट भी लगाई है. साथ ही मुख्य सचिव को एक महीने के भीतर आदेश के पालन से संबंधित रिपोर्ट अदालत में पेश करने के निर्देश दिए हैं.
वेतनमान और रिकवरी से जुड़ा मामला
यह मामला जगदीश प्रसाद कैन के वेतनमान और 38.76 लाख रुपये की रिकवरी से जुड़े दो अलग-अलग मामलों का है. जगदीश प्रसाद कैन के निधन के बाद उनकी पत्नी रेखा जैन ने न्यायालय में पैरवी जारी रखी. उनके अधिवक्ता देवेश शर्मा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने सिंगल बेंच के फैसलों के खिलाफ 327 और 330 दिन की देरी से रिट अपीलें दायर कीं, लेकिन देरी के पीछे कोई ठोस और संतोषजनक कारण नहीं बताया गया.
रिकॉर्ड से सामने आई देरी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने विभागीय रिकॉर्ड मंगवाए. रिकॉर्ड से पता चला कि अधिशासी यंत्री मेघा शर्मा ने 27 अप्रैल 2026 को कारण बताओ नोटिस का जवाब दे दिया था, लेकिन इसके बावजूद मुख्य अभियंता वीके छारी ने दो महीने से अधिक समय तक फाइल पर कोई निर्णय नहीं लिया. आखिरकार 30 जून 2026 को फाइल इंजीनियर-इन-चीफ के पास भेजी गई. इसी देरी को लेकर अदालत ने मुख्य अभियंता से जवाब तलब किया.
‘फ्रॉड ऑन द कोर्ट’ की टिप्पणी
अदालत ने यह भी पाया कि अधीक्षण यंत्री आरके सिंह के शपथपत्र में दिए गए तथ्य विभागीय रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते. खंडपीठ ने इसे न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास और “फ्रॉड ऑन द कोर्ट” की श्रेणी में माना. अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों अधिकारियों को लगाई गई कॉस्ट अपने निजी बैंक खातों से जमा करनी होगी और राज्य सरकार इस राशि का भुगतान या प्रतिपूर्ति नहीं करेगी.