बिना नक्सलियों की इजाजत नहीं होती थी शादियां, सालों बाद पहली बारात देखकर खुश हुए गांव के लोग
खुश हुए गांव वाले
Chhattisgarh News: अब देश नक्सलमुक्त हो चुका है तो पुराने टूटे रिश्ते और नए रिश्तों में भी बहार लौट आई है. लोग आपस में मिलजुलकर पूरा गांव एक साथ इकठ्ठा होकर खुशियां मना रहा है. लेकिन दौर था कि जब इस गांव में सालों तक संगीत नहीं सुनाई देता था. किसी भी लड़के-लड़की को हल्दी नहीं चढ़ती थी. दूर गलियों में भी बच्चे खेलते हुए नहीं दिखाई देते थे. इस गांव में कोई भी अपनी लड़की का विवाह करने को तैयार नहीं होता था.
कामाराम गांव की कहानी
सालों से यहां किसी की बारात भी नहीं आई थी, और अब जब लाल आंतक समाप्त हुआ तो एक बार फिर से इस गांव में रौनक लौट आई. ये कहानी छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के कामाराम गांव की है. इस गांव में रहने वाले लोगों ने सालों से किसी की बारात नहीं देखी थी. किसी को शादी करनी ही होती तो उन्हें पहले नक्सलियों से मंजूरी लेनी होती थी. गांव के लोगों को नक्सलियों को बताना पड़ता था कि फलां इलाके में रिश्ता जोड़ सकते हैं या नहीं! रिश्ता जोड़ने की बात मान गए तो बारात में कितने बाराती आएंगे, कितने बजे तक कार्यक्रम होगा, बाराती गांव से कब तक लौट जाएंगे…
नक्सलियों को देना पड़ती थी पूरी जानकारी
ये पूरा ब्योरा देना होता था, अगर नक्सली सहमत हो जाते है तो ही शादी-विवाह हो सकता था. अब ऐसी शादी में सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी का तो सवाल ही नहीं बनता. परिवार खुद अपने रिश्तेदारों को नहीं बुला पाते थे. हालांकि, अब जब इलाके से नक्सलियों का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है तो रिश्ते एक बार फिर जुड़ने लगे हैं.
जगरगुंडा से करीब 10 किमी दूर
बस्तर जिले के जगरगुंडा से करीब 10 किमी दूर कामाराम गांव में दंतेवाड़ा के गोंगपाल गांव से बारात पहुंची थी. 2005 के बाद इलाके में यह पहला मौका था जब किसी की बारात यहां गाड़ियों के साथ धूमधाम से पहुंची थी. ऐसे में इस बारात को देखने के लिए गांव में भी भीड़ उमड़ पड़ी थी. लोगों के चेहरे पर उसी प्रकार की मुस्कान और खुशी थी जो शायद 1947 में आजादी के समय लोगों ने महसूस की होगी.
नक्सलियों की दहशत का प्रभाव
नक्सलियों की दहशत का प्रभाव केवल शादी-ब्याह और छट्ठी जैसे सुख के कार्यक्रमों तक नहीं था, बल्कि लोग अपने किसी की मौत या बीमार पड़ने पर भी जगरगुंडा और आसपास के इलाकों में जाने से कतराते थे। इलाके में हल्बा, आदिवासी समाज के अलावा अन्य समाज के लोग भी रहते हैं.
ये लोग पहले शादी के लिए न पंडितों से मुहूर्त निकलवा सकते थे और न ही दुख के कार्यक्रम में बिना भय पूरे विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न करवा सकते थे. यही वजह रही कि लंबे वक्त तक इस क्षेत्र से पलायन भी होता रहा. अब बस्तर नक्सलमुक्त है तो लोग अपने गांव-घर की ओर लौटने लगे हैं.