CG News: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में देवेंद्र यादव को बड़ा झटका, चुनाव याचिका पर साक्ष्य दर्ज करने के बाद होगा फैसला
विधायक देवेंद्र यादव
CG News: बिलासपुर हाई कोर्ट ने कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव से जुड़े चुनाव याचिका मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है. अदालत ने याचिका में उठाए गए दो मुद्दों पर पहले सुनवाई करने की मांग खारिज कर दी. हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों की पूरी जांच के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जा सकता है.
हाई कोर्ट में देवेंद्र यादव को बड़ा झटका
यह चुनाव याचिका प्रेम प्रकाश पांडे द्वारा दायर की गई है, जिसमें चुनाव परिणाम को चुनौती दी गई है. अदालत ने कहा कि मामले का समुचित निपटारा पूर्ण ट्रायल के बाद ही संभव होगा. अब इस प्रकरण की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की गई है. मामले पर सभी पक्षों की नजर बनी हुई है, क्योंकि आगे की सुनवाई में साक्ष्यों और कानूनी दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा.
क्या है पूरा मामला?
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडे ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की विभिन्न धाराओं के तहत चुनाव याचिका दायर कर भिलाई नगर सीट से देवेंद्र यादव के निर्वाचन को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनावी शपथपत्र में सोशल मीडिया खातों, आय, संपत्ति और लंबित आपराधिक मामलों से संबंधित आवश्यक जानकारियां पूरी तरह उजागर नहीं की गई. मामले में दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने अगस्त 2024 में पांच मुद्दे निर्धारित किए थे. इससे पहले देवेंद्र यादव की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को भी सुप्रीम कोर्ट फरवरी 2026 में खारिज कर चुका है, और उन्हें हाईकोर्ट में चुनाव याचिका का सामना करने के निर्देश दिए थे.
प्रारंभिक मुद्दों पर पहले फैसले की मांग
विधायक देवेंद्र यादव की ओर से अधिवक्ताओं ने आवेदन प्रस्तुत कर अदालत से अनुरोध किया था कि मुद्दा क्रमांक 2 और 4 को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय कर पहले उन पर निर्णय दिया जाए। उनका पक्ष था कि नामांकन और शपथपत्र में सभी आवश्यक विवरण प्रस्तुत किए गए थे, इसलिए इन बिंदुओं पर बिना साक्ष्य दर्ज किए भी फैसला संभव है.
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प्रेम प्रकाश पांडे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एन. के. शुक्ला और अधिवक्ता देवाशीष तिवारी ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि विवादित प्रश्नों का संबंध तथ्यों से है, जिनका प्रतिवादी द्वारा खंडन किया गया है. ऐसे में साक्ष्य और गवाहों के परीक्षण के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना न्यायसंगत नहीं होगा.