खैर, कत्था और काली दुनिया: तस्कर मनीष अग्रवाल का ‘पुष्पा’ स्टाइल क्राइम सिंडिकेट, AI से भी लगाई सेंध
Manish Agarwal Smuggler: रायपुर. फिल्म ‘पुष्पा: द राइज’ में चंदन की लाल लकड़ियों की तस्करी और जंगलों के सीने पर तस्करों का राज देखने के बाद दर्शकों को लगा था कि यह सिनेमाई दुनिया का फिक्शन है. लेकिन छत्तीसगढ़ और ओडिशा के घने जंगलों की हकीकत पर्दे पर दिखने वाली कहानियों से कहीं ज्यादा खतरनाक और शातिर है. इस काले कारोबार का नया खलनायक बनकर उभरा है मनीष अग्रवाल. 50 टन कीमती खैर की लकड़ी का अवैध डंप, तेंदुआ खाल तस्करी के पुराने दाग, और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार फर्जी ट्रांजिट पास (TP) का यह मामला किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है.
जंगलों का नया ‘पुष्पा’ और सफेदपोश तस्कर की एंट्री
ओडिशा के सोनेपुर, बलांगीर और मयूरभंज के घने जंगल अपनी प्राकृतिक संपदा के लिए जाने जाते हैं. यहीं से शुरू होती है मनीष अग्रवाल के काले कारोबार की दास्तान. जिस तरह फिल्म में पुष्पा राज जंगलों से लकड़ी काटकर पुलिस को चकमा देता था, उसी तरह मनीष अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ के रायपुर को अपना सेफ जोन बना रखा था (Pushpa Movie Real Life Case). सारंगढ़-बिलाईगढ़ के सरसीवां इलाके से ताल्लुक रखने वाला मनीष साधारण तस्कर नहीं है, बल्कि वह वन अपराधों का एक ऐसा शातिर खिलाड़ी है जिसके तार अंतरराज्यीय नेटवर्क से जुड़े हैं. (Chhattisgarh-Odisha Khair Wood Scam)
कानून की नजरों में वह पहले भी बेनकाब हो चुका है. साल 2019-20 में उसका नाम वन्यजीवों के सबसे खतरनाक शिकार तेंदुआ खाल तस्करी (Leopard Skin Smuggling) के मामले में सामने आया था. इसके बाद 2021 में रायपुर के माना कैंप थाना क्षेत्र में पुलिस ने वीआईपी रोड के पास घेराबंदी कर एक बड़ा खुलासा किया था. उस दौरान उसके करीबी निखिल अग्रवाल के पास से एक ट्रॉली बैग में संरक्षित वन्यजीव तेंदुए की खाल बरामद हुई थी. इस मामले में मनीष अग्रवाल की संलिप्तता पाई गई थी, और रायपुर की तृतीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीमती प्रतिभा वर्मा की अदालत ने उसकी जमानत याचिका को खारिज करते हुए उसकी आपराधिक प्रवृत्ति की गंभीरता को उजागर किया था. अदालत के आदेश और केस डायरी के मुताबिक, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-वन के जीवों का शिकार और व्यापार इस गिरोह की धमकियों का प्रमाण था. बावजूद इसके, मनीष ने अपनी राह नहीं बदली और लकड़ी की दुनिया में लौट आया.
AI का खतरनाक इस्तेमाल: फर्जी टीपी और डिजिटल क्राइम
इस पूरी क्राइम स्टोरी का सबसे आधुनिक और चौंकाने वाला पहलू है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल. पारंपरिक तस्कर जहां कागजों में हेराफेरी या रिश्वत के दम पर फर्जी परमिट बनवाते थे, वहीं मनीष अग्रवाल ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर जुर्म के तरीके को पूरी तरह बदल दिया था. (Fake AI Transit Pass)
वन विभाग की उड़नदस्ता टीम और राज्य उड़नदस्ता के अधिकारियों (संदीप सिंह राजपूत, रेंजर दीपक तिवारी और डिप्टी रेंजर संतोष सामंतराय) को जब मुखबिर से सूचना मिली कि रायपुर के एक यार्ड में भारी मात्रा में खैर की लकड़ी डंप है, तो पुलिस और वन विभाग के संयुक्त दल ने तड़के छापा मारा. वहां से 50 टन खैर के गोले और ट्रक जब्त किए गए. लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि जब्ती के दौरान जो दस्तावेज मिले, वे इतने सटीक और असली प्रतीत होते थे कि पहली नजर में कोई धोखा खा जाए.
मोबाइल और डिजिटल उपकरणों की फॉरेंसिक जांच में यह राज खुला कि मनीष और उसका मुंशी ओडिशा, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तर प्रदेश वन विभाग के ट्रांजिट पास (TP) और परमिट्स को एआई टूल्स की मदद से हूबहू तैयार कर लेते थे. कंप्यूटर जनित डिजिटल मुहरों, फॉन्ट और क्यूआर जैसे दिखने वाले पैटर्न्स के जरिए वन विभाग की आंखों में धूल झोंकी जा रही थी. ओडिशा के बड़पाड़ा थाने में दर्ज एफआईआर (क्र. 282/2024) और दस्तावेजों के अनुसार, खैर और केंदू लकड़ी से भरे ट्रकों को इसी फर्जी तकनीक के जरिए छत्तीसगढ़ के रास्ते हरियाणा और यूपी भेजा जाता था, जहां से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार नेपाल तक लकड़ी की तस्करी का यह जाल फैला हुआ था.
कत्थे की खुशबू और खून से सनी लकड़ियां
खैर (Acacia catechu) की लकड़ी यूं ही तस्करों की पहली पसंद नहीं है. यह बहुपयोगी लकड़ी कत्था बनाने के मुख्य काम आती है, जिसका उपयोग पान और आयुर्वेद से लेकर कई उद्योगों में होता है. इसके अलावा, पुराने पेड़ों की छाल से निकलने वाला सफेद रवेदार पदार्थ ‘खैरसाल’ अपने आप में एक दुर्लभ और बेहद महंगी औषधि है. इसी ऊंचे मुनाफे के लालच में मनीष अग्रवाल ने अपने गिरोह के साथ मिलकर जंगलों को उजाड़ना शुरू किया.
ओडिशा के बेलपाड़ा थाना क्षेत्र से पकड़े गए ट्रक (UP-12-T-7895) और उसमें मिले ड्राइवरों व सहयोगियों (जैसे हलधर लोहार और मनोज मेहर) से पूछताछ में यह साफ हो गया कि यह पूरा नेटवर्क एक कॉर्पोरेट सिंडिकेट की तरह काम कर रहा था. मुंशी रखना, दूसरे राज्यों से मजदूर बुलाना, फर्जी कागजात तैयार करना और ट्रकों की आवाजाही पर डिजिटल नजर रखना-यह सब इस बात का सबूत है कि वन्य अपराध अब केवल स्थानीय स्तर का अवैध कटान नहीं, बल्कि हाई-टेक व्हाइट कॉलर क्राइम बन चुका है.
वन विभाग और रायगढ़ पुलिस की साझा कार्रवाई ने भले ही मनीष अग्रवाल के इस साम्राज्य को झटका दिया हो, लेकिन मुख्य सरगना की फरारी यह बताती है कि यह सिंडिकेट कितना बड़ा है. ओडिशा के जंगलों से लेकर रायपुर के गोदामों और नेपाल की सरहद तक फैला यह जाल इस बात का गवाह है कि जब लालच में तकनीक मिल जाती है, तो प्रकृति का विनाश किस भयानक स्तर पर होता है. अदालत की फाइलों से लेकर जंगल की पगडंडियों तक, खैर की इन लकड़ियों की हर एक सिल्ली इस बात की कहानी कह रही है कि कानून के हाथ भले ही लंबे हों, लेकिन अपराधियों के डिजिटल पैंतरे उन्हें मात देने की कोशिश में आज भी लगे हुए हैं.
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