बिना MLA-MLC बने दीपक प्रकाश मंत्री! सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा- आखिर कैसे? मांगा जवाब

Bihar Minister Deepak Prakash Case: बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने उन्हें मंत्री पद पर किस संवैधानिक आधार पर बनाए रखा गया है.

Deepak Prakash Minister Without Election: बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति एक बार फिर कानूनी बहस का विषय बन गई है.गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब दीपक प्रकाश न विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य, तब उन्हें मंत्री पद पर किस संवैधानिक आधार पर बनाए रखा गया है?अदालत ने इस मामले को गंभीर संवैधानिक प्रश्न बताते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है.

याचिका में दावा किया गया है कि दीपक प्रकाश पहले भी बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं. उस दौरान उन्होंने लगभग चार महीने 26 दिन तक मंत्री पद संभाला था. बाद में सरकार बदलने पर उनका कार्यकाल समाप्त हो गया.

करीब 22 दिन के अंतराल के बाद नई सरकार बनने पर उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जबकि वे तब भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों कार्यकाल को जोड़ने पर वे छह महीने से अधिक समय तक बिना निर्वाचित हुए मंत्री बने रहे हैं, जो संविधान की भावना के विपरीत है.

सुनवाई के दौरान क्‍या-क्‍या हुआ?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यह पूरी तरह कानून की व्याख्या से जुड़ा मामला है. अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को यह बताना होगा. किसी व्यक्ति को लगातार या अलग-अलग कार्यकाल जोड़कर छह महीने से अधिक समय तक बिना जनप्रतिनिधि बने मंत्री बनाए रखने का संवैधानिक आधार क्या है? मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की गई है.

क्‍या कहते हैं न‍ियम?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है. यदि इस अवधि के भीतर वह किसी सदन का सदस्य नहीं बनता है, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.

मौजूदा विवाद इसी प्रावधान की व्याख्या को लेकर है कि क्या अलग-अलग कार्यकालों को जोड़कर छह महीने की सीमा लागू होगी. प्रत्येक नए कार्यकाल के साथ छह महीने की नई अवधि शुरू मानी जाएगी. इसी संवैधानिक प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट अंतिम निर्णय देगा, जिसका असर भविष्य में ऐसे मामलों पर भी पड़ सकता है.

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