कभी ममता बनर्जी के खास थे सुवेंदु अध‍िकारी! बगावत के बाद फिर कैसे बन गए बंगाल के मुख्‍यमंत्री?

Suvendu Adhikari Journey: सुवेंदु अधिकारी बंगाल के नए मुख्यमंत्री बन चुके हैं. पहले वो ममता बनर्जी के साथ मिलकर ही काम किया करते थे. लेकिन ऐसा क्‍या हुआ कि उन्‍होंने ममता का साथ छोड़ दिया? आइये जानते हैं.
सुवेंदु अध‍िकारी

सुवेंदु अध‍िकारी

Suvendu Adhikari Journey: पश्चिम बंगाल में 15 सालों की मेहनत के बाद आखिरकार आज यानी कि 9 मई 2026 को बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर सुवेंदु अधिकारी ने शपथ ले ली है. बंगाल में जीत की पटकथा और पूरी जिम्मेदारी सुवेंदु अधिकारी ने ही निभाई है, यही वजह है कि सुवेंदु अधिकारी को बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाया है. इससे पहले सुवेंदु ममता के ही साथ मिलकर राजनीति किया करते थे. उन्‍होंने साल 2020 में एक मैसेज के बाद टीएमसी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था.

साल 2020 की बात है, अक्टूबर का महीना था. उस समय विधानसभा चुनावों का शोर पूरे राज्‍य समेत देशभर में था. टीएमसी में सुवेंदु नंबर दो की पोजीशन पर काम कर रहे थे. लेकिन उन्‍होंने पार्टी बदलने का फैसला कर लिया था.  

नंदीग्राम आंदोलन से उभरे शुभेंदु अधिकारी लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस के मजबूत स्तंभ माने जाते थे. पूर्वी मेदिनीपुर इलाके में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उन्हें पार्टी का “ग्राउंड मैनेजर” कहा जाता था. ममता सरकार में उन्होंने परिवहन, सिंचाई और जलमार्ग जैसे अहम विभाग भी संभाले थे. लेकिन समय के साथ पार्टी के अंदर समीकरण बदलने लगे/  

अभिषेक बनर्जी के कारण छोड़ी थी टीएमसी?

साल 2020 में ही टीएमसी के पार्टी संगठन में ममता बनर्जी के भांजे अभिषेक का दखल बढ़ने गा था. यही वजह माना जा रहा है  कि पार्टी और सुवेंदु में दूरियां बनती चली गईं. 2020 के दौरान दोनों खेमों के बीच तनाव खुलकर सामने आने लगा. कई बार लगा कि सुवेंदु अब पार्टी छोड़ देंगे, हालांकि उन्‍हें उस समय मना लिया गया. इसका असर यह हुआ कि राजनीतिक मंचों पर शुभेंदु के बयान और रैलियों में बदलते संकेतों ने साफ कर दिया था कि वे पार्टी लाइन से अलग राह पकड़ चुके हैं.

नवंबर 2020 में दूरियां और बढ़ गईं

 नवंबर 2020 में सुवेंदु ने पहले हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया. इसके बाद राज्य मंत्रिमंडल छोड़ दिया. उनके इस्तीफे से पूरे प्रदेश के साथ-साथ देश में हलचल मच गई. हालांकि उन्हें मनाने के लिए पार्टी के बड़े नेता पहुंचे थे जिनमें खुद ममता भी शामिल थी. बैठक में तय हुआ कि सुवेंदु साथ में रहकर ही काम करेंगे. सबको लगा की अब सब ठीक हो गया है. लेकिन अंदरखाने बहुत कुछ चल रहा था.

सुवेंदु ने इस बैठक के कुछ दिनों बाद ही  सौगत राय को एक मैसेज किया और अपनी समस्या बताई. इसमें कहा कि अब वह एक साथ काम नहीं कर पाएंगे. क्योंकि उनकी बात को नहीं सुना गया. इसके बाद उन्होंने टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया.

सौगत रॉय को भेजे मैसेज में उन्होंने लिखा- ‘मेरी टीस अभी भी बरकरार है. आपने बिना समाधान निकाले ही सब कुछ मुझ पर थोप दिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुझे अपनी बात कहनी थी, लेकिन आपने पहले ही घोषणा करके मेरा मौका छीन लिया. अब साथ चलना मुमकिन नहीं. मुझे माफ कर दें.’

उस समय ममता बनर्जी ने पार्टी को “मजबूत बरगद” बताते हुए कहा था कि कुछ नेताओं के जाने से संगठन पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन आने वाले सालों में यही फैसला बंगाल की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया.

बीजेपी में शामिल होते ही बदल गए सुवेंदु के तेवर

बीजेपी में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने खुद को पार्टी के सबसे आक्रामक चेहरे के रूप में स्थापित किया. विधानसभा से लेकर सड़क तक उन्होंने लगातार ममता सरकार पर हमला बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ा. संदेशखाली, भ्रष्टाचार और चिटफंड जैसे मुद्दों पर उन्होंने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यही वजह रही कि वे बहुत कम समय में ही बंगाल में बीजेपी का चेहरा बन गए.  

टीएमसी छोड़ना सुवेंदु के लिए हुआ फायदे का सौदा

2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी बीजेपी के सबसे बड़े रणनीतिक चेहरों में शामिल रहे. उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर जैसी सीटों पर चुनाव लड़कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. चुनाव परिणामों में बीजेपी को ऐतिहासिक सफलता मिली और राज्य में पहली बार पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई. इसके बाद विधायक दल की बैठक में शुभेंदु को नेता चुना गया और उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी छोड़ने का उनका फैसला केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन बदलने की शुरुआत भी साबित हुआ.   

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