‘पहचान छिपाकर शादी करने पर हक नहीं छीन सकते’, लव जिहाद के मामले में HC का पीड़िता को 20 हजार हर महीने देने का आदेश

हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में जस्टिस गजेंद्र सिंह ने फैमिली कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया. साथ ही पीड़िता और बच्ची दोनों के भरण-पोषण के लिए 10-10 हजार रुपये हर महीने देने का आदेश सुनाया.
Indore Bench of High Court (File Photo)

हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ(File Photo)

MP News: ‘अगर पहचान छिपाकर शादी की है, तो किसी महिला का हक नहीं छीन सकते हैं. खास तौर पर जब महिला के बच्चे भी हों. महिला को भरण पोषण के लिए आर्थिक रूप से मदद करनी होगी. महिला को भरण पोषण की राशि सिर्फ इस वजह से ना देना कि शादी वैध नहीं है, ये महिला को दोबारा पीड़ित करने जैसा है.’

ये आदेश मध्य प्रदेश की इंदौर हाई कोर्ट ने लव जिहाद के एक मामले में सुनाया है. साथ ही आरोपी पति को महिला और उसकी बच्ची के भरण-पोषण के लिए 20 हजार रुपये हर महीने देने का भी आदेश दिया है.

‘पहचान छिपाकर हिंदू युवती से की थी शादी’

दरअसल एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू युवती से पहचान छिपाकर शादी की थी. दोनों की शादी कोविड के दौरान फरवरी 2020 में हुई थी. युवक ने हिंदू रीति-रिवाज और मंत्रोच्चार के साथ हिंदू युवती से मंदिर में शादी की थी. लेकिन बाद में युवती को पता चला कि युवक हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम है. आरोपी ने झूठ बोलकर और पहचान छिपाकर शादी की है. इस दौरान दोनों के एक बच्ची भी हुई. लेकिन सच्चाई पता चलने के बाद युवक युवती पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा. विरोध करने पर मारपीट की और लगातार प्रताड़ित कर रहा था.

फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण देने से किया इनकार

पूरा मामला फैमिली कोर्ट में गया. जहां फैमिली कोर्ट ने 26 अगस्त 2023 को भरण-पोषण देने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि पहचान छिपाकर की गई शादी वैध नहीं है. हालांकि बच्ची के लिए हर महीने 2 हजार रुपये महीने का आदेश दिया. इसके बाद फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पीड़िता ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई. साथ ही मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत मामला दर्ज किया गया.

‘भरण-पोषण ना देना दोबारा पीड़ित करने जैसा’

हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में जस्टिस गजेंद्र सिंह ने फैमिली कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया. साथ ही पीड़िता और बच्ची दोनों के भरण-पोषण के लिए 10-10 हजार रुपये हर महीने देने का आदेश सुनाया. यानी आरोपी को पीड़िता को कुल 20 हजार रुपये हर महीने देने होंगे. कोर्ट ने कहा कि अगर शादी वैध नहीं है तो पीड़िता को भरण पोषण देना उसको दोबारा पीड़िता बनाने जैसा होगा. खासकर जब पीड़िता के बच्चे भी हैं.

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