MP News: मध्‍य प्रदेश में गोमांस तस्करी सिस्टम सोया, ग्राउंड इंटेलिजेंस फेल, हर बार हिंदू संगठन पकड़ रहे खेप

MP News: गोमांस तस्करी के मामलों में एक पैटर्न लगातार सामने आ रहा है. वह है–हर बड़ी खेप पहले हिंदू संगठनों के हाथ लगती है, उसके बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आता है.
Cases of cow smuggling are increasing in Madhya Pradesh

मध्‍य प्रदेश में बढ़ रहे गौमांस तस्‍करी के मामले

MP News: मध्‍य प्रदेश में गोवध और गोमांस तस्करी के मामलों में एक पैटर्न लगातार सामने आ रहा है. वह है–हर बड़ी खेप पहले हिंदू संगठनों के हाथ लगती है, उसके बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आता है. सवाल यह है कि जिन विभागों पर कानून-व्यवस्था और खुफिया निगरानी की जिम्मेदारी है, उन्हें इन गतिविधियों की समय रहते जानकारी क्यों नहीं मिल रही. पुलिस और इंटेलिजेंस सिस्टम गोवध के मामलों में लगातार कमजोर क्यों साबित हो रहा है. जबकि जिन इलाकों से नियमित रूप से तस्करी हो रही है, वहां वर्षों से एक ही रूट, एक ही समय और एक ही तरीका अपनाया जा रहा है, इसके बावजूद न तो इनपुट मिलते हैं और न ही प्रो-एक्टिव कार्रवाई होती है.

प्रदेश में लागू है गौमांस तस्‍करी का सबसे बड़ा कानून

प्रदेश में गोवध और गोमांस तस्करी पर देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक लागू है. गैर-जमानती धाराएं, लंबी सजा और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधान हैं, इसके बावजूद गोवध और गोमांस तस्करी की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं. इसका सीधा जवाब सिस्टम की लापरवाही और तस्करों के संगठित नेटवर्क में छिपा है. इसका अंदाजा नगर निगम के स्लॉटर हाउस से कंटेनर में भरकर ले जाए जा रहे 26.5 टन गौमांस की कार्रवाई से लगाया जा सकता है, जिसकी पुलिस को भनक तक नहीं लगी. हिंदू संगठनों ने आधी रात कंटेनर रोका. भारी विरोध के बाद प्रशासन मांस का सैंपल लेने को तैयार हुआ.

डॉक्टर बेनी प्रसाद गौर ने बेईमानी की पूरी हदें पार कर दीं. उसने गोमांस को भैंस का मांस बताकर स्लॉटर हाउस संचालक असलम कुरैशी को बचाने का पूरा प्रयास किया. उसकी रिपोर्ट का परिणाम यह हुआ कि गोमांस की तस्करी सुरक्षित तरीके से हो गई. मांस बाजार में खपा दिया गया. इस सब के बाद मथुरा की लैब से आई रिपोर्ट में गोमांस का खुलासा होने पर असलम कुरैशी समेत कंटेनर चालक को आरोपी बनाकर आनन-फानन में जेल भेजा गया.

हिंदू संगठनों की सतर्कता, सिस्टम की सुस्ती

हिंदू संगठन स्थानीय स्तर पर लगातार निगरानी रखते हैं. रात में मूवमेंट, संदिग्ध वाहनों और तय रूट्स पर उनकी नजर रहती है. वहीं दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाई अक्सर सूचना मिलने के बाद तक सीमित रहती है. यानी सूचना का स्रोत विभाग नहीं, बल्कि हिंदू संगठन के पदाधिकारी बन रहे हैं. यह स्थिति सिस्टम की गंभीर कमजोरी को उजागर करती है. हिंदू संगठन के पदाधिकारियों का दावा है कि कई जगह गोवंश वध के अड्डे और परिवहन के रूट वर्षों से तय हैं, फिर भी उन्हें नेटवर्क तोड़ने की कोई ठोस रणनीति प्रशासन नहीं अपना रहा. नतीजतन गोवध और गोमांस की तस्करी जारी है.

नेटवर्क में हर स्तर का काम अब गोमांस तस्करी एक-दो लोगों का अपराध नहीं रह गया है. यह संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है, जिसमें वध करने वाले, मांस संग्रह करने वाले, प्रोसेसिंग व पैकेजिंग करने वाले, ट्रांसपोर्टर और फाइनेंसर तक शामिल हैं. इसके बावजूद कार्रवाई अक्सर सिर्फ ड्राइवर या छोटे गुर्गों तक सीमित रह जाती है. सरगना, फंडिंग करने वाले और संरक्षण देने वाले लोग जांच के दायरे से बाहर रह जाते हैं. कई मामलों में नगर निगम के स्लॉटर हाउस, चेक पोस्ट और ट्रांजिट परमिट सिस्टम पर सवाल खड़े हुए हैं. कागजों में सब कुछ वैध दिखता है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और होती है. जिम्मेदार अधिकारियों पर सीधे आरोप तय करने के बजाय अक्सर लापरवाही कहकर मामला खत्म कर दिया जाता है.

इंटेलिजेंस फेलियर या जानबूझकर आंख मूंदना

गोमांस तस्करी बिना स्थानीय जानकारी के संभव नहीं है. पुलिस, परिवहन विभाग और प्रशासन के पास सूचनाएं होती हैं, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं होती. कई बार शिकायतों को हल्के में लिया जाता है. यह लापरवाही है या फिर जानबूझकर नजरअंदाजी, यह सवाल लगातार उठ रहा है. कई मामलों में जांच कमजोर होने के कारण आरोपी अदालत से राहत पा लेते हैं. जब्ती की कार्रवाई अधूरी रहती है, चार्जशीट में खामियां रह जाती हैं और गवाह मुकर जाते हैं. इसका सीधा संदेश तस्करों को जाता है कि कानून सख्त है, लेकिन बच निकलने के रास्ते भी खुले हैं.

नेटवर्क नहीं टूटने की यह बड़ी वजह

  • बड़े सरगनाओं पर कार्रवाई का अभाव
  • फंडिंग और मनी ट्रेल की जांच नहीं
  • सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी
  • जिम्मेदार अफसरों पर ठोस दंड नहीं
  • लगातार मॉनिटरिंग का अभाव
  • गोमांस तस्करों को राजनीतिज्ञों का अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष संरक्षण

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