मंदिर टूट गया, खड़े हैं हनुमान जी… उज्जैन का चमत्कारी मंदिर, जहां म‍ूर्ति विस्‍थापन में छूटे प्रशासन के पसीने

Ujjain News: सवारी मार्ग के चौड़ीकरण की जद में आए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर के भवन को हटा दिया गया है. हालांकि, मंदिर में विराजित हनुमान जी की प्रतिमा को अब तक सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित नहीं किया जा सका है.
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खड़े हनुमान उज्जैन

Ujjain News: उज्जैन में सिंहस्थ 2028 को लेकर विकास और निर्माण कार्य तेजी से चल रहे हैं. इसी क्रम में सवारी मार्ग के चौड़ीकरण की जद में आए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर के भवन को हटा दिया गया है. हालांकि, मंदिर में विराजित हनुमान जी की प्रतिमा को अब तक सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित नहीं किया जा सका है.

प्रशासन पिछले करीब पांच दिनों से प्रतिमा को हटाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान पर ही बनी हुई है. फिलहाल प्रतिमा के आसपास टेंट लगाकर पूजा-अर्चना की जा रही है.

सड़क चौड़ीकरण में मंदिर भवन हटाया गया

कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण के दौरान मंदिर को हटाने की कार्रवाई की गई. भवन पूरी तरह तोड़े जाने के बाद अब प्रतिमा के विस्थापन की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है. इसी बीच विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी ने प्रतिमा की ऐतिहासिकता को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी है.

एक हजार साल पुरानी होने का अनुमान

पुरातत्व विभाग के मुताबिक, प्रतिमा जिस पत्थर से बनी दिखाई दे रही है, वह मालवा क्षेत्र में पाया जाने वाला बेसाल्ट है. उनका अनुमान है कि यह प्रतिमा करीब एक हजार वर्ष पुरानी हो सकती है और इसका संबंध राजा भोज के दौर में प्रचलित प्रतिमा निर्माण परंपरा से रहा होगा. हालांकि, प्रतिमा की वास्तविक उम्र और उसके निर्माण काल की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी.

सिंदूर के नीचे छिपी प्रतिमा की मूल बनावट

पुरातत्व विशेषज्ञ ने बताया कि प्रतिमा पर लंबे समय से सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण उसकी मूल आकृति और भाव-भंगिमा स्पष्ट नजर नहीं आती. इसके बावजूद प्रतिमा के पीछे दिखाई देने वाले पत्थर से उसके बेसाल्ट से निर्मित होने के संकेत मिलते हैं. परमार काल और राजा भोज के समय मालवा में इसी तरह के मजबूत पत्थरों पर मूर्तियां बनाए जाने की परंपरा रही है.

पुराविद ने बताया कि मंदिर का स्‍थान ऐतिहासिक दृष्ट‍ि से महत्वपूर्ण है. छोटा सराफा नमक मंडी, गोपाल मंदिर, दानी गेट और क्षिप्रा नदी का यह क्षेत्र प्रचाीन उज्जय‍िनी के महत्वपूर्ण हिस्‍सों में रहा है. यह क्षेत्र सिंधिया राजवंश के करीब 300 साल पुराने इतिहास राजा भोज काल के चौबीस खंभा क्षेत्र और बाद के दौर में बने सती गेट की विरासत से जुड़ा है.

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