Mauganj: बरसात में उजड़े आशियाने, 21 दिन बाद भी नहीं मिला घर, बेघर आदिवासी परिवार पहुंचे कलेक्ट्रेट

Mauganj News: मानसून के बीच अपने टूटे घरों और अधूरे वादों का हिसाब मांगने पहुंचे 30 से अधिक आदिवासी परिवारों ने दलित-आदिवासी महासभा के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट का मुख्य द्वार जाम कर दिया.
Homeless tribal families reach the Collectorate.

बेघर आदिवासी परिवार पहुंचे कलेक्ट्रेट

Mauganj News: किसी गरीब के लिए उसका घर केवल ईंट, मिट्टी और खपरैल का ढांचा नहीं होता, बल्कि उसकी पूरी जिंदगी की पूंजी, उसके बच्चों का भविष्य और उसके सपनों का आशियाना होता है. लेकिन जब यही आशियाना प्रशासनिक कार्रवाई की भेंट चढ़ जाए और उसके बाद भी हफ्तों तक पुनर्वास न मिले, तो दर्द आखिर कब तक खामोश रहेगा?

मऊगंज जिले में यही दर्द जनआक्रोश बनकर सड़कों से होते हुए कलेक्ट्रेट पहुंचा. मानसून के बीच अपने टूटे घरों और अधूरे वादों का हिसाब मांगने पहुंचे 30 से अधिक आदिवासी परिवारों ने दलित-आदिवासी महासभा के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट का मुख्य द्वार जाम कर दिया. करीब एक घंटे तक कलेक्ट्रेट परिसर आंदोलनकारियों के नारों से गूंजता रहा और प्रशासन को प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए मैदान में उतरना पड़ा.

मानसून में टूटे घर, 21 दिन बाद भी नहीं मिला आशियाना

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि झऊरा सहित आसपास के गांवों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने मानसून शुरू होने के बाद उनके मकानों को ढहा दिया. कार्रवाई इतनी जल्दबाजी में की गई कि कई परिवारों को अपना घरेलू सामान तक समेटने का मौका नहीं मिला. अधिकारियों ने उसी समय भरोसा दिया था कि प्रभावित परिवारों को जल्द ही पुनर्वास के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन 21 दिन बीत जाने के बाद भी न जमीन मिली और न ही रहने का कोई स्थायी इंतजाम किया गया.

खुले आसमान के नीचे कट रही जिंदगी, बारिश बनी सबसे बड़ी मुसीबत

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं और बुजुर्गों की व्यथा सुनकर हर कोई भावुक हो उठा. उन्होंने बताया कि घर टूटने के बाद से पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है. बरसात शुरू होते ही बच्चों को बचाने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं रहती. रात में तेज बारिश होने पर परिवार पूरी रात खड़े होकर बिताता है. प्लास्टिक की चादरें तेज हवा में उड़ जाती हैं, राशन भीग जाता है और छोटे-छोटे बच्चे बारिश और ठंड के कारण बीमार पड़ रहे हैं. उनका कहना था कि प्रशासन ने घर तो तोड़ दिए, लेकिन रहने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की.

महिलाओं का छलका दर्द, बच्चों का भविष्य बना चिंता

प्रदर्शन के दौरान कई महिलाओं की आंखें नम हो गईं. उनका कहना था कि छोटे बच्चों के साथ खुले में रहना सबसे बड़ी मजबूरी बन गया है. न खाना सुरक्षित है, न कपड़े सूखे रहते हैं और न ही रात को चैन की नींद नसीब होती है. बरसात का हर दिन उनके लिए नई मुसीबत लेकर आ रहा है. उनका सवाल था कि आखिर गरीब होने की इतनी बड़ी सजा क्यों दी जा रही है?

सात दिन का वादा, इक्कीस दिन का इंतजार

दलित-आदिवासी महासभा के जिला अध्यक्ष बुद्धसेन साकेत ने प्रशासन पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा कि अधिकारियों ने सात दिन के भीतर पुनर्वास का आश्वासन दिया था, लेकिन तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन ने शीघ्र भूमि आवंटन और पुनर्वास नहीं किया तो आंदोलन और उग्र होगा तथा जेल भरो आंदोलन शुरू किया जाएगा.

कलेक्ट्रेट का मुख्य गेट रहा बंद, अधिकारियों को करनी पड़ी समझाइश

प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि आंदोलनकारियों ने कलेक्ट्रेट का मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर दिया. करीब एक घंटे तक अधिकारी, कर्मचारी और आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित रही. स्थिति को संभालने के लिए डिप्टी कलेक्टर रश्मि चतुर्वेदी, एसडीएम एस.पी. द्विवेदी और तहसीलदार वीरेंद्र पटेल मौके पर पहुंचे. अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से लंबी बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं और पुनर्वास प्रक्रिया तेज करने का भरोसा दिया.

सगरा के पास होगी पुनर्वास की जमीन

तहसीलदार वीरेंद्र पटेल ने बताया कि झऊरा गांव में शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं है. इसलिए सगरा गांव के पास उपलब्ध शासकीय भूमि को पुनर्वास के लिए चिन्हित किया गया है. प्रशासनिक टीम मौके पर जाकर जांच करेगी और जिन आदिवासी परिवारों के पास स्वयं की जमीन नहीं है, उन्हें पात्रता के आधार पर भूमि आवंटित की जाएगी. प्रशासन के इस लिखित आश्वासन के बाद प्रदर्शनकारी शांत हुए और धरना समाप्त कर वापस लौट गए.

मानवीय संवेदनाओं पर खड़े हुए बड़े सवाल

यह पूरा घटनाक्रम केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है. यदि किसी परिवार का घर हटाना जरूरी था, तो क्या पुनर्वास की व्यवस्था पहले सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए थी? मानसून के बीच बेघर हुए परिवारों की पीड़ा, बारिश में भीगते मासूम बच्चों की बेबसी और खुले आसमान के नीचे गुजरती रातें प्रशासनिक व्यवस्था से कई असहज सवाल पूछ रही हैं.

अब सबकी नजर प्रशासन पर

फिलहाल आंदोलन प्रशासन के आश्वासन के बाद समाप्त हो गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है. क्या सगरा में भूमि आवंटन का वादा समय पर पूरा होगा, या फिर ये बेघर परिवार अगली बारिश भी उसी खुले आसमान के नीचे गुजारने को मजबूर होंगे? मऊगंज के इन आदिवासी परिवारों की निगाहें अब केवल आश्वासनों पर नहीं, बल्कि जमीन पर उतरते पुनर्वास पर टिकी हैं.

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