उत्तर प्रदेश में ‘श्री राम’ के बाद ‘श्री कृष्ण’ पर दांव? 2027 के लिए योगी की नई रणनीति ने बढ़ाई हलचल

UP CM Yogi 2027 Plan: उत्तर प्रदेश व‍िधानसभा चुनाव से पहले अयोध्‍या के बाद अब प्रदेश में मथुरा की चर्चा होने लगी है. ऐसा कहा जा रहा है कि बीजेपी इस चुनाव में मथुरा को मुद्दा बनाकर जनता के सामने आएगी.
मथुरा सांसद हेमा माल‍िनी और सीएम योगी

मथुरा सांसद हेमा माल‍िनी और सीएम योगी

UP CM Yogi election 2027 Plan: उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए बीजेपी तैयारियों में लगी है, तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष भी अपने वनवास को खत्म करने की कोशिशों में जुटा हुआ है. इन सब के बीच मथुरा का जिक्र भी यूपी की सियासत में जमकर होने लगा है. ऐसा कहा जा रहा है कि अब बीजेपी अयोध्‍या के बाद मथुरा को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में उतरना चाहती है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 3 और 4 सितंबर को मथुरा-वृंदावन के दौरे पर रहेंगे. सबसे खास बात उनके इस दौरे पर मथुरा में जन्माष्टमी की धूम रहेगी. यहां सीएम योगी बांके बिहारी मंदिर और श्रीकृष्ण जन्मभूमि में दर्शन के साथ करीब 446 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण करेंगे.

‘जय श्रीराम’ के साथ ‘कृष्ण बिहारी’ क्यों?

योगी आदित्यनाथ की हाल की सभाओं में ‘जय श्रीराम’ के साथ ‘कृष्ण बिहारी’ के जयकारे पर खास ध्यान दिया जा रहा है. सिद्धार्थनगर से लेकर आजमगढ़, इटावा, आगरा और फतेहपुर तक उनके भाषणों में यह बदलाव देखा गया है. राजनीतिक तौर पर इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि बीजेपी 2027 के लिए अयोध्या के राम नैरेटिव को मथुरा के कृष्ण नैरेटिव से जोड़ना चाहती है.

यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि 2027 का चुनाव सिर्फ धार्मिक मुद्दों पर नहीं लड़ा जाएगा. बीजेपी के सामने सत्ता में वापसी के साथ-साथ अलग-अलग जातीय समूहों को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती भी है.

विपक्ष के सामने नई चुनौती

बीजेपी के इस नैरेटिव ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि चुनाव नजदीक आते ही बीजेपी धार्मिक मुद्दों को आगे कर रही है.  इससे रोजगार, महंगाई, किसान तथा विकास जैसे सवाल पीछे जा सकते हैं. दूसरी ओर बीजेपी का तर्क है कि सांस्कृतिक पहचान और विकास दोनों साथ-साथ चल सकते हैं.

बीजेपी के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अयोध्या के बाद मथुरा कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा. बल्कि यह है कि राम और कृष्ण की सांस्कृतिक राजनीति को सरकारी योजनाओं के साथ जोड़कर कितना वोट बैंक अपने पाले में लाया जा सकता है.

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