बस्तर में मोती की खेती के लिए अनुकूल वातावरण, फिर भी किसानों में रुचि नहीं
जगदलपुर. बस्तर की जलवायु मोती की खेती के लिए अनुकूल पाए जाने के बावजूद यहां के किसानों में इसे लेकर रुचि नहीं दिखाई दे रही है. कृषि विज्ञान केंद्र में मोती की खेती के सफल प्रयोग के बाद किसानों को इसका प्रशिक्षण भी दिया गया. इसके अलावा गोठानों में काम करने वाले महिला स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को भी मोती उत्पादन की तकनीक बताई गई, लेकिन प्रशिक्षण के बाद भी इस दिशा में अपेक्षित पहल नहीं हो सकी है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मोती के लिए बाजार की उपलब्धता को माना जा रहा है.
कृषि विज्ञान केंद्र में मोती की खेती का प्रयोग सफल होने के बाद किसानों को इसके उत्पादन की प्रक्रिया समझाई गई थी. जिले के विभिन्न गोठानों में काम कर रहे महिला समूहों और किसानों को भी प्रशिक्षण दिया गया. बस्तर में पर्याप्त संख्या में तालाब और जल संसाधन होने के कारण मोती की खेती को ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बनाने की संभावनाएं हैं.
सालभर में तैयार होते हैं मोती
मोती की खेती तालाब के अलावा छोटे टैंक में भी की जा सकती है. इसके लिए सीप में शल्यक्रिया के माध्यम से कैल्शियम के छोटे कण प्रत्यारोपित किए जाते हैं. इसके बाद सीप को कुछ समय तक उचित देखभाल में रखा जाता है. अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर इन्हें छोटे तालाब या टैंक में रखा जाता है, जहां सीप के भीतर मोती का निर्माण होता है. सामान्य तौर पर यह प्रक्रिया करीब 12 से 14 महीने में पूरी होती है.
आय बढ़ाने का बन सकता है जरिया
केंद्र और राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही हैं. केंद्र सरकार की मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से मछली पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है. ऐसे में मछली पालन के साथ मोती की खेती को भी प्रोत्साहित किया जाए तो किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार हो सकता है. मोती की खेती में अपेक्षाकृत कम लागत और मेहनत की जरूरत होने के कारण इसे छोटे किसानों और महिला स्व-सहायता समूहों के लिए भी उपयोगी गतिविधि बनाया जा सकता है.
आभूषण के साथ औषधि में भी उपयोग
मोती का इस्तेमाल केवल आभूषण बनाने में ही नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक औषधियों में भी किया जाता है. बस्तर में उपलब्ध तालाबों, जलस्रोतों और सीपियों के कारण यहां मोती उत्पादन की संभावनाएं बताई जाती हैं. इसके बावजूद बाजार की व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान इसे अपनाने से पीछे हट रहे हैं. वर्तमान में मोती की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने वाली कोई विशेष योजना भी संचालित नहीं है. बाजार और सरकारी प्रोत्साहन की व्यवस्था होने पर बस्तर में मोती उत्पादन को ग्रामीण आय के एक अतिरिक्त साधन के रूप में विकसित किया जा सकता है.
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