छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: विज्ञापन नहीं, नियुक्ति तिथि से तय होगी न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च न्यायिक सेवा की वरिष्ठता विवाद पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी अधिकारी की वरिष्ठता विज्ञापन जारी होने की तिथि से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक नियुक्ति की तिथि से तय की जाएगी.
cg highcourt

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बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च न्यायिक सेवा की वरिष्ठता विवाद पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी अधिकारी की वरिष्ठता विज्ञापन जारी होने की तिथि से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक नियुक्ति की तिथि से तय की जाएगी.

अदालत ने साफ किया कि कोई भी कर्मचारी कैडर में आने से पहले की तिथि से वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकता. जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वंदना दीपक देवांगन द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला दिया है.

क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता वंदना दीपक देवांगन ने हाईकोर्ट के समक्ष याचिका दायर कर 25 जनवरी 2021 की वरिष्ठता सूची और 4 फरवरी 2021 के ज्ञापन को चुनौती दी थी. उनका तर्क था कि उन्होंने अनुसूचित जाति (महिला) वर्ग के तहत चयन प्रक्रिया पूरी कर 26 जून 2014 को पदभार ग्रहण कर लिया था, जबकि निजी प्रतिवादी (क्रमांक 4 से 11) बाद में 30 अक्टूबर 2014 को नियुक्त किए गए थे. इसके बावजूद उन्हें ग्रेडेशन सूची में निजी प्रतिवादियों के नीचे रखा गया था.

वहीं, हाईकोर्ट और अन्य प्रतिवादियों की ओर से तर्क दिया गया था कि निजी प्रतिवादियों ने एक अलग विज्ञापन के तहत चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था और प्रशासनिक देरी के कारण उनके नियुक्ति आदेश बाद में जारी हुए थे.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और नियमों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायिक सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 2006 के नियम 11 (3) (iii) और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘के. मेघाचंद्र सिंह बनाम निगम सिरो’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया. अदालत ने दोहराया कि सेवा में आने से पहले की अवधि या केवल विज्ञापन जारी होने की तिथि के आधार पर किसी को पूर्ववर्ती वरिष्ठता नहीं दी जा सकती, क्योंकि चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले कोई अधिकार निहित नहीं होता.

अदालत का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए माना कि रजिस्ट्रार जनरल द्वारा याचिकाकर्ता को निजी प्रतिवादियों के नीचे रखा जाना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था. अदालत ने प्रतिवादी प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वह नियमों और आदेश के अनुरूप संशोधित एवं सही वरिष्ठता (ग्रेडेशन) सूची तैयार करे.

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