बंगाल में जजों से ही पहचान का सबूत मांग बैठा चुनाव आयोग, SIR की सुनवाई पर बढ़ा विवाद

West Bengal SIR: पश्‍च‍िम बंगाल में जजो की पहचान को लेकर चुनाव आयोग ने सबूत मांगे है. यही वजह है कि इसको लेकर व‍िवाद बढ़ गया. इस फैसले से दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया है.
UP SIR Draft List

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West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारियों के बीच विवाद बढ़ता नजर आ रहा है. मतदाताओं की अपीलों पर सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों से चुनाव आयोग ने अब उनकी पहचान से जुड़े दस्तावेज मांगे हैं. आयोग ने डिजिटल सिग्नेचर बनवाने के लिए जजों को पैन कार्ड और सरकारी पहचान पत्र जमा करने को कहा है. इस फैसले से दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने न्यायाधिकरणों में तैनात जजों को डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) बनवाने की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं. इसके लिए एक निजी एजेंसी को जिम्मेदारी दी गई है. एजेंसी ने 28 अक्टूबर को ईमेल भेजकर जजों को जरूरी दस्तावेज और सत्यापन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी थी.

आधार वेरिफिकेशन पर पहले से विवाद

दरअसल, चुनाव आयोग ने 21 सितंबर को अपीलों की सुनवाई से जुड़े पोर्टल पर आधार वेरिफिकेशन अनिवार्य कर दिया था. इस फैसले पर न्यायिक अधिकारियों ने आपत्ति जताई थी. उन्होंने 24 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर पोर्टल से आधार सत्यापन की शर्त हटाने की मांग की थी.

इसके बाद जजों ने आयोग के पोर्टल पर लॉग इन करना बंद कर दिया. हालांकि, वे ऑफलाइन तरीके से सुनवाई का काम कर रहे हैं. इससे मामलों के निपटारे और अंतिम आदेश जारी करने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है.

जजों को देने होंगे ये दस्तावेज

डिजिटल सिग्नेचर बनवाने के लिए जजों को पैन कार्ड, सरकारी पहचान पत्र, फोटो, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी देनी होगी. इसके अलावा वीडियो कॉल के जरिए मूल दस्तावेजों का सत्यापन भी किया जाएगा. डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट के लिए 2,300 रुपये शुल्क तय किया गया है.

37 लाख से ज्यादा अपीलें लंबित

इस पूरे विवाद का असर मतदाताओं की अपीलों पर भी पड़ रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, कुल 38.31 लाख अपीलों में से सिर्फ 1.26 लाख का निपटारा हुआ था. यानी 37 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को मतदाता सूची से जुड़े मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों को सौंपी थी. अब तकनीकी और प्रशासनिक विवाद के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने मामलों के फैसले का इंतजार करना पड़ रहा है.

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