Dhar Bhojshala Case: इंदौर हाई कोर्ट शिफ्ट हुआ धार भोजशाला मामला, 23 फरवरी को खुलेगी ASI रिपोर्ट

जबलपुर हाईकोर्ट में बुधवार को धार स्थित भोजशाला विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि यह मामला धार जिले से संबंधित है, जो इंदौर खंडपीठ के अधिकार क्षेत्र में आता है.
bhojshala_dhar_

धार भोजशाला (फाइल फोटो)

Dhar Bhojshala Case:जबलपुर हाईकोर्ट में बुधवार को धार स्थित भोजशाला विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि यह मामला धार जिले से संबंधित है, जो इंदौर खंडपीठ के अधिकार क्षेत्र में आता है. इसी आधार पर अदालत ने निर्देश दिया कि अब इस प्रकरण की सुनवाई इंदौर हाईकोर्ट में की जाएगी. चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ही इंदौर में इस मामले को सुनेगी और इसके लिए 23 फरवरी की तारीख तय की गई है. सुनवाई के दौरान याचिकाओं से जुड़े सभी अधिवक्ता मौजूद रहे.

23 फरवरी को खोली जाएगी ASI की रिपोर्ट

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने पक्ष रखा. अदालत ने यह भी कहा कि 23 फरवरी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट खोली जाएगी.इससे पहले भोजशाला विवाद से जुड़े मामलों को इंदौर खंडपीठ से जबलपुर की प्रिंसिपल सीट पर स्थानांतरित किया गया था. पूजा के अधिकार और नमाज की अनुमति से जुड़े इस संवैधानिक विवाद पर बुधवार को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की.

भोजशाला में हिंदू श्रद्धालु करते थें पूजा

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस सहित अन्य पक्षों ने याचिका में दावा किया है कि 1010 से 1055 ईस्वी के बीच राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला मूल रूप से देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. उनके अनुसार यहां वेद, शास्त्र, ज्योतिष और खगोल जैसे विषयों का अध्ययन होता था और यह सनातन परंपराओं का महत्वपूर्ण गुरुकुल रहा है. याचिका में यह भी कहा गया है कि बाद के मुस्लिम शासकों के समय परिसर को नुकसान पहुंचाया गया, लेकिन उसकी धार्मिक पहचान नहीं बदली और हिंदू श्रद्धालु वहां पूजा करते रहे. ब्रिटिश काल में इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रचारित किए जाने को भी याचिकाकर्ताओं ने तथ्यों के विपरीत बताया है.

पुरातत्व विभागने मुस्लिम पक्ष को दी थी नमाज की अनुमति

विवाद का एक प्रमुख कारण वर्ष 2003 का वह आदेश भी है, जिसमें पुरातत्व विभाग ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी थी, जबकि हिंदू पक्ष के पूजा अधिकारों पर सीमाएं तय की गई थीं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है. उन्होंने अनुच्छेद 29 के तहत सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अनुच्छेद 49 के तहत ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा की राज्य की जिम्मेदारी का भी हवाला दिया है. इस कारण यह मामला धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा अहम विवाद बन गया है.

2006 से लंबित है मामले से जुड़ी अपील

इस प्रकरण से जुड़ी एक अपील वर्ष 2006 से लंबित है. सोमवार को इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने चार याचिकाएं सूचीबद्ध थीं, लेकिन वकीलों के प्रतिवाद दिवस के कारण याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता उपस्थित नहीं हो सके. सुप्रीम कोर्ट के 22 जनवरी के आदेश पर विचार करते हुए बेंच ने पाया कि 2006 से लंबित अपील पर निर्णय जरूरी है. इसके बाद मामले को प्रशासनिक आदेश के लिए प्रिंसिपल सीट भेजा गया और भोजशाला विवाद से जुड़े सभी पांच मामलों को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के सामने सूचीबद्ध कर दिया गया. अब इस पूरे विवाद की अगली सुनवाई 23 फरवरी को इंदौर में होगी.

ये भी पढे़ं- क्या है धार का भोजशाला विवाद? 900 साल पुराना परिसर, नमाज और प्रार्थना के दावों को लेकर टकराव

ज़रूर पढ़ें