64 साल से भारत में पहचान की जंग लड़ रहा चीनी सैनिक का परिवार, पोते-पोतियों के जाति प्रमाण पत्र पर संकट, जानें पूरी कहानी

Chinese Soldier Story: बालाघाट जिले की तिरोड़ी तहसील में रहने वाले पूर्व चीनी सैनिक वांग ची के परिवार के पोते-पोतियों के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाना चुनौती बना हुआ है.
The family of former Chinese soldier Wang Qi.

पूर्व चीनी सैनिक वांग ची का परिवार

Chinese Soldier Story: भारत में छह दशक से अधिक समय से रह रहे पूर्व चीनी सैनिक वांग ची के परिवार के सामने अब एक नई परेशानी खड़ी हो गई है. बालाघाट जिले की तिरोड़ी तहसील में रहने वाले उनके पोते-पोतियों के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाना चुनौती बना हुआ है. परिवार का कहना है कि जरूरी दस्तावेजों और स्थानीय स्तर पर आ रही दिक्कतों के कारण बच्चों के जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहे हैं, जिससे उन्हें सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ लेने में परेशानी हो रही है.

चीनी सैनिक वांग ची के बेटे विष्णु का कहना है कि “अगर भारत सरकार मुझे और मेरे बच्चों को नागरिक सुविधाएं नहीं दे सकती, तो मेरे पिता और पूरे परिवार को चीन भेज दिया जाए.” उनका कहना है कि उनके बच्चों के जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहे हैं. विष्णु के मुताबिक, एसडीएम ने उनसे सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत वापस लेने को भी कहा है.

1962 के युद्ध के बाद भारत में रह गए वांग ची

वांग ची 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भटकते हुए भारतीय सीमा में आ गए थे. इसके बाद उन्हें युद्धबंदी बनाकर करीब सात साल तक चंडीगढ़, भोपाल और बालाघाट की जेलों में रखा गया. वर्ष 1969 में कोर्ट के आदेश पर उन्हें इस शर्त के साथ रिहा किया गया कि उन्हें चीन वापस नहीं भेजा जाएगा और वे अपना बाकी जीवन भारत में ही बिताएंगे.

तिरोड़ी में मिली नौकरी, भारतीय महिला से हुई शादी

रिहाई के बाद वांग ची को बालाघाट से करीब 80 किलोमीटर दूर तिरोड़ी में रहने की अनुमति मिली. यहां सेठ इंदरचंद जैन ने उन्हें अपनी आटा चक्की में काम दिया. हिंदी न जानने के बावजूद वांग ची अपने व्यवहार से स्थानीय लोगों के बीच घुल-मिल गए. गांव वालों की पहल पर उनकी शादी तिरोड़ी की सुशीला से हुई, जो कुनबी समाज से थीं. दोनों के चार बच्चे हुए और सभी के नाम के साथ वांग उपनाम लगाया गया.

अब बच्चों के जाति प्रमाण पत्र पर अटका मामला

विष्णु साइंस ग्रेजुएट हैं. उनका कहना है कि उनके सभी प्रमाण पत्र उनकी मां की जाति के आधार पर बने थे. अब उनके बेटे प्रणीत और बेटी कनक के जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहे हैं. विष्णु का सवाल है कि जब उनका जन्म भारत में हुआ और उनके सभी दस्तावेज भारतीय हैं, तो उनके बच्चों के दस्तावेज क्यों नहीं बनाए जा रहे. कनक नौवीं कक्षा में है और सांदीपनि विद्यालय में प्रवेश के लिए उसे जाति प्रमाण पत्र की जरूरत है. इसी को लेकर विष्णु ने सीएम हेल्पलाइन में शिकायत की थी.

इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई को भी लिखा था पत्र

वांग ची ने अपनी नागरिकता को लेकर कई बार सरकार से गुहार लगाई. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई को पत्र लिखे. वर्ष 1984 में राष्ट्रपति को भेजे पत्र में उन्होंने बताया था कि वह विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान कर चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिली है.

पुलिस पर प्रताड़ना के लगाए आरोप

88 वर्षीय वांग ची पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि तिरोड़ी आने के शुरुआती वर्षों में पुलिस उन्हें परेशान करती थी. उनका आरोप है कि उन्हें चीन का जासूस बताकर मारपीट की जाती थी और काम करने के दौरान उनसे पैसे मांगे जाते थे. वांग के मुताबिक, पत्नी सुशीला की वर्ष 2017 में उचित इलाज नहीं मिलने से मौत हो गई. उनके जवान बेटे और मिर्गी से पीड़ित छोटे बेटे श्याम की भी मौत हो चुकी है.

55 साल बाद पहली बार गए थे चीन

वर्ष 2017 में करीब 55 साल बाद वांग ची को चीन जाने का मौका मिला. वह परिवार के साथ करीब दो महीने चीन में रहे. विष्णु के मुताबिक, वहां उनके पिता का स्वागत किसी सेलिब्रिटी की तरह हुआ. वांग अपनी मां से बेहद प्रेम करते थे. चीन पहुंचने के बाद जब उन्हें मां के निधन की जानकारी मिली तो वह उनकी समाधि पर करीब दो घंटे तक रोते रहे. इसी दौरान भारत में उनकी पत्नी की तबीयत बिगड़ गई और परिवार वापस लौट आया.

शासन से परामर्श लेकर समाधान का भरोसा

बालाघाट के अपर कलेक्टर जीएस धुर्वे ने कहा कि वर्तमान नियमों के अनुसार जाति का निर्धारण सामान्य तौर पर पिता के दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है. हालांकि यह मामला युद्धबंदी से जुड़ा है, इसलिए शासन से परामर्श लेकर नियमानुसार समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा.

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