रायसेन में 40 साल बाद परंपरा दोबारा जिंदा! चांदबड़ में झिरआई फाग की धूम; महिलाएं बरसाती हैं लाठियां, पुरुष करते हैं बचाव

40 साल बाद फिर से 'झिरआई फाग' प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. स्थानीय विधायक देवेंद्र पटेल के चचेरे भाई वीर नारायण पटेल के संरक्षण में जब इस लुप्त होती विधा को दोबारा शुरू किया गया, तो आसपास के 25 गांवों की टोलियां इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने खिंची चली आईं.
Jhirai Phaag was started in Raisen after 40 years.

रायसेन में में झिरआई फाग की 40 साल बाद शुरुआत की गई.

Input- विजय सिंह राठौर

MP News: मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के बेगमगंज से एक बेहद ही रोमांचक और हैरतअंगेज खबर सामने आई है. यहां ग्राम चांदबड़ में पूरे 40 साल बाद एक ऐसी परंपरा को दोबारा जीवित किया गया, जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया. कड़कती धूप, हाथों में लाठियां लिए महिलाओं की फौज और 50 फीट ऊंचा एक चिकना खंभा, इस खंभे पर चढ़कर धर्म ध्वजा को फहराना कोई मामूली खेल नहीं, बल्कि जान जोखिम में डालने जैसी अग्निपरीक्षा है. लेकिन इस कठिन परीक्षा को पार कर एक 19 साल के युवा ने वो कर दिखाया, जिसकी चर्चा अब पूरे इलाके में है. क्या है यह ‘झिरआई फाग’ की अनोखी परंपरा और कैसे इस युवा ने लाठियों की बौछार के बीच फहराया परचम?

25 गांवों की टोलियां ऐतिहासिक पल की गवाह बनीं

मृदंग की थाप, ढोलक की गूंज और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बीच गूंजते लोकगीत. रायसेन के बेगमगंज का चांदबड़ गांव में सैकड़ों लोगों की भीड़ से दिखाई दी. 40 साल बाद फिर से ‘झिरआई फाग’ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. स्थानीय विधायक देवेंद्र पटेल के चचेरे भाई वीर नारायण पटेल के संरक्षण में जब इस लुप्त होती विधा को दोबारा शुरू किया गया, तो आसपास के 25 गांवों की टोलियां इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने खिंची चली आईं.

जितना पारंपरिक, उतना ही कठिन और खतरनाक

बेगमगंज में आयोजित ये कार्यक्रम जितना पारंपरिक है, उतना ही कठिन और खतरनाक भी है. खेल के नियम के मुताबिक मैदान के बीचों-बीच 50 से 60 फीट ऊंचा एक मोटा लकड़ी का स्तंभ गाड़ा जाता है. इस खंभे को गेरू और खाद्य तेल मलकर इतना चिकना कर दिया जाता है कि इस पर पैर टिकाना भी नामुमकिन हो जाए. चुनौती सिर्फ ये चिकनाई नहीं है. असली परीक्षा तो उन महिलाओं से पार पाना है, जो नीचे लाठियां तानकर खड़ी हैं. चिलचिलाती धूप में जैसे ही कीर्ति ध्वजा के पूजन के बाद प्रतियोगिता शुरू हुई, मैदान मानो जंग के मैदान में तब्दील हो गया. एक-एक कर टोलियों ने आगे बढ़ना शुरू किया. पुरुष अपने हाथों में ‘T’ आकार की लकड़ी लेकर खुद का बचाव कर रहे थे, तो दूसरी तरफ लंबी-लंबी लाठियां लिए महिलाओं की टोलियां उन पर घातक प्रहार कर रही थीं. लाठियों की इस मार से बचने के चक्कर में कई लोग चूके और चोटिल भी हुए, लेकिन रोमांच से भरा ये पारंपरिक खेल थमा नहीं.

19 साल के निखिल की बहादुरी को सलाम

करीब दो घंटे तक ये जद्दोजहद चलती रही. तभी मैदान में एंट्री होती है 19 साल के साहसी युवक निखिल रैकवार की. महिलाओं की लाठियों की भारी मार सहने के बाद भी निखिल के हौसले नहीं डिगे. वो रेंगते, फिसलते हुए, आखिरकार उस 50 फीट ऊंचे चिकने स्तंभ के शीर्ष पर पहुंच गया. एक जोरदार झटके के साथ उसने वहां बंधी धर्म ध्वजा और प्रसाद की पोटली को तोड़ दिया. निखिल के झंडा तोड़ते ही पूरा चांदबड़ गांव तालियों और जयकारों से गूंज उठा. इस ऐतिहासिक जीत पर मुख्य अतिथि और क्षेत्रीय विधायक देवेंद्र पटेल ने मंच पर बुलाकर जांबाज निखिल रैकवार का तिलक लगाया, पुष्पमाला पहनाई और निर्धारित 21 हजार रुपए का नगद पुरस्कार देकर उसकी बहादुरी को सलाम किया.

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