पहले जमीन अब आशियाने की बारी, केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभाव‍ित ग्रामीण सिर छिपाने को बना रहे झोपड़े

Ken-Betwa Pariyojana Prabhavit Villagers: केन बेतवा लिंक पर‍ियोजना से प्रभाव‍ित लोगों को अब घर खाली करने का दबाव झेलना पड़ रहा है. लेकिन बसने की जगह अब भी अधूरी है. यही वजह है कि लोग खुद झोपड़ियां बनाकर नए ठिकाने की तैयारी कर रहे हैं.
अब घर जाने का डर

अब घर जाने का डर

Villagers Build Huts After Eviction: केन-बेतवा लिंक परियोजना न स‍िर्फ बुंदेलखंड  अंचल के लिए खास है. बल्कि केंद्र सरकार भी इस परियोजना को लेकर सख्त है. लेकिन इस परियोजना के कारण हजारों लोग विस्थापित भी हुए हैं. पिछले दिनों विस्थापितों ने विरोध प्रदर्शन भी किया था. हालांकि इस प्रदर्शन के बाद अब लोग डर के माहौल में हैं.

बेतवा नदी लिंक परियोजना के कारण छतरपुर जिले के करौंदया और आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. जिन परिवारों की जमीन और मकान परियोजना की जद में आए हैं, वे एक तरफ प्रशासनिक कार्रवाई के डर में हैं तो दूसरी तरफ पुनर्वास की अधूरी व्यवस्था से परेशान हैं.

 हालात ऐसे हैं कि कई परिवारों ने मुआवजा मिलने का इंतजार छोड़कर खुद ही करौंदया में जोड़ियां बनानी शुरू कर दी हैं. प्रशासन की सख्ती के कारण अब लोग खुद ही अपने गुजर बसर की व्यवस्थाओं में लग गए हैं.

क्‍या कहते हैं ग्रामीण

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने उन्हें जल्द से जल्द पुराने घर खाली करने के निर्देश दिए हैं. कई मकान तो पहले ही तोड़े जा चुके हैं, जबकि कुछ परिवारों को अभी तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है. ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल सिर छिपाने की जगह का है.

ग्रामीणों का आरोप है कि जिन जगहों पर उन्हें बसाने की बात कही गई थी, वहां अब तक बिजली, पानी, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी है. कई परिवारों को प्लॉट तो आवंटित कर दिए गए, लेकिन वहां रहने लायक माहौल तैयार नहीं हुआ. लोगों का कहना है कि बिना पानी और बिजली के परिवारों को वहां भेजना व्यावहारिक नहीं है.

इसी वजह से कुछ परिवार अपने स्तर पर अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहने की तैयारी कर रहे हैं. उनका तर्क है कि यदि पुराने गांव से हटना ही पड़ेगा तो कम से कम किसी तरह रहने की व्यवस्था तो करनी होगी.

प्रशासनिक कार्रवाई का भी डर

परियोजना क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच यह आशंका भी है कि यदि उन्होंने समय पर मकान खाली नहीं किए तो उनके खिलाफ एफआईआर या अन्य कानूनी कार्रवाई हो सकती है. इसी डर के कारण कई परिवार जल्दबाजी में सामान समेट रहे हैं और वैकल्पिक ठिकानों की तलाश कर रहे हैं.

कई परिवारों को अब भी मुआवजे का इंतजार

प्रभावित लोगों का दावा है कि कुछ परिवारों को अभी तक मुआवजे की पूरी राशि नहीं मिली है, जबकि कुछ मामलों में जमीन और संपत्ति के मूल्यांकन को लेकर भी विवाद बना हुआ है. ऐसे परिवारों का कहना है कि जब तक उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिलता, तब तक नई जगह पर स्थायी मकान बनाना संभव नहीं है.

फिलहाल स्थिति यह है कि एक ओर परियोजना का काम आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवार अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं. कई लोग मजबूरी में झोपड़ियां खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास रहने का दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा है.

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