Bashir Badr: बशीर बद्र ने मेरठ दंगों में गंवाया सबकुछ! फिर भोपाल बना ठिकाना, अलीगढ़-बरेली से भी रहा नाता
बशीर बद्र साहब (फाइल फोटो)
” है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है…”
बशीर बद्र साहब ने ये लाइनें कब लिखी होंगी, ये तो नहीं पता लेकिन इनसे ये जरूर पता चलता है कि उनको अपना शहर-गांव और गलियां छोड़ने की टीस अपने अंतिम दिनों तक याद रही है. उर्दू ग़ज़लों के बादशाह कहे जाने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. 91 साल की उम्र पूरी कर चुके बशीर साहब का कई शहरों से गहरा नाता रहा है. भले ही उनका जन्म 5 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्या) में हुआ हो, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बनाया था. इसके पीछे की भी एक बड़ी वजह है.
दरअसल मेरठ दंगों की वजह से उन्हें काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था. दंगों के कारण उनकी सालों की कमाई पलभर में जलकर रख हो चुकी थी. इसका सदमा उन्हें ऐसा लगा कि बशीर साहब ने शहर छोड़ने का फैसला ही ले लिया.
7 साल की उम्र में शेरो शायरी की दूनिया में रखा कदम
बशीर बद्र का बचपन से ही साहित्य की तरफ बड़ा झुकाव था. उन्होंने महज 7 साल की उम्र में ही शेरो शायरी की दूनिया में कदम रख दिया और शायरी लिखना शुरू कर दिया. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पढ़ाई की है. जहां बशीर साहब ने बीए, एमए और फिर उर्दू साहित्य में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने एएमयू में लेक्चरर का काम किया.
बशीर बद्र ने उर्दू गजल को दी नई पहचान
मशहूर शायर ने उर्दू गजल को नई पहचान दी. उन्होंने शायरी को मुश्किल फारसी और अरबी शब्दों की जटिलता से बाहर निकालकर आम लोगों की भाषा से जोड़ा. उनकी गजलें आसान हिंदी-उर्दू लफ्जों में होती थीं, जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचती थीं. यही वजह रही कि उनके शेर हर तबके के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए. बशीर बद्र हमेशा मानते थे कि शायरी ऐसी होनी चाहिए जिसे हर इंसान महसूस कर सके. आज भी उनके कई शेर देश के बड़े नेता और प्रधानमंत्री संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों पर सुनाते नजर आते हैं.
” ग़ज़लों का हुनर अपनी आंखों को सिखाएंगे
रोएंगे बहुत लेकिन आंसू नहीं आएंगे…”
मेरठ दंगों ने बदलकर रख दी पूरी दूनिया
अलीगढ़ में पढ़ाई पूरी करने के बाद बशीर बद्र मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष बने और करीब 17 साल तक वहां अपनी सेवाएं दीं. मेरठ में उनका खूबसूरत घर था, जहां उनकी जिंदगीभर की कमाई, दुर्लभ किताबें, डायरी और अनमोल गजलें सुरक्षित रखी थीं. लेकिन 1987 के मेरठ दंगों ने उनकी दुनिया बदल दी. दंगाइयों ने उनके घर को लूटने के बाद आग लगा दी, जिससे उनकी यादें, डिग्रियां और शायरी के कई बेशकीमती पन्ने जलकर राख हो गए. इस हादसे ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया और लंबे समय तक उन्होंने लिखना भी छोड़ दिया था.
विशाल भारद्वाज ने बद्र साहब की ग़ज़लों को फिर संजोया
उस दौर में फिल्म निर्देशक कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे और अक्सर बशीर बद्र के पास बैठकर उनकी गजलें सुना करते थे. जब दंगों में बशीर साहब की रचनाएं जल गईं, तब विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे उनकी कई गजलें दोबारा लिखकर उन्हें सौंप दीं. मेरठ छोड़ने के बाद बशीर बद्र कुछ समय तक बरेली में रहे और फिर दोस्तों की सलाह पर भोपाल आ गए. भोपाल का शांत माहौल और अदबी फिजा उनके टूटे मन के लिए मरहम साबित हुई, जहां से उन्होंने अपनी जिंदगी को फिर से संभालना शुरू किया.
” सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी…”
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