यूपी में बदला M-Y का मतलब! मोदी-योगी बनाम PDA, 2027 में किसका चलेगा दांव?
सीएम योगी और पीएम मोदी
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी एम-वाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था. मुलायम सिंह यादव के दौर में इसी सामाजिक गठजोड़ ने सपा को सत्ता तक पहुंचाया और लंबे समय तक पार्टी की राजनीति इसी आधार पर चलती रही. लेकिन, पिछले एक दशक में प्रदेश की राजनीति का स्वरूप तेजी से बदला है. भाजपा ने न केवल इस समीकरण की चुनौती को कमजोर किया, बल्कि एम-वाई की नई राजनीतिक व्याख्या भी गढ़ दी है.
अब भाजपा के लिए एम-वाई का मतलब मुस्लिम-यादव नहीं, बल्कि मोदी-योगी की जोड़ी बन गया है. पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक छवि मिलकर ऐसा चुनावी समीकरण तैयार करती है, जो जातीय गणित से ऊपर जाकर वोटरों को प्रभावित करता है. भाजपा इसी फॉर्मूले के सहारे 2027 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
केंद्र की योजनाओं पर राज्य सरकार का जोर
भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचा है. मुफ्त राशन, आवास, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने एक बड़ा लाभार्थी वर्ग तैयार किया है. वहीं योगी सरकार कानून-व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, निवेश और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है. पार्टी को भरोसा है कि मोदी-योगी की जोड़ी विकास, सुरक्षा और हिंदुत्व के मुद्दों पर मजबूत जनसमर्थन जुटा सकती है.
सपा ने भी बदल दी अपनी रणनीति
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी अपनी रणनीति बदल चुकी है. अखिलेश यादव अब केवल मुस्लिम-यादव वोट बैंक पर निर्भर नहीं रहना चाहते. उन्होंने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ का नया राजनीतिक नारा दिया है. इसके जरिए सपा गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
सपा को उम्मीद है कि 2024 लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन को वह 2027 तक बनाए रख सकेगी. इसके साथ ही अखिलेश यादव धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी पहले की तुलना में अधिक सक्रिय नजर आ रहे हैं. राजनीतिक जानकार इसे भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे की काट के रूप में देख रहे हैं.
2027 में किसी की राह नहीं आसान
हालांकि 2027 की राह सपा के लिए आसान नहीं होगी. भाजपा जहां मोदी-योगी की लोकप्रिय जोड़ी को मैदान में उतारेगी, वहीं अखिलेश यादव पीडीए समीकरण के जरिए सामाजिक गठबंधन मजबूत करने की कोशिश करेंगे. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव केवल दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक मॉडलों और दो नए एम-वाई फॉर्मूलों के बीच सीधा मुकाबला बनता दिखाई दे रहा है.
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