इस्लामाबाद में शांति वार्ता या कूटनीतिक दांव-पेंच? ईरान-अमेरिका की बातचीत से पहले संदेह और सस्पेंस का जाल
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में यूएस ईरान टॉक्स
US Iran Talks: पश्चिम एशिया के सबसे खतरनाक टकरावों में से एक, अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान स्थित इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता पर सबकी निगाहें टिकी हैं. हालांकि, इस वार्ता को लेकर जितनी उम्मीदें हैं, उससे कहीं ज़्यादा आशंकाओं और संदेह के बादल छाप हुए हैं. भले ही पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पाकिस्तान को अमेरिकी सिक्के का ही एक पहलू मान रहे हैं. ऐसे में शांति वार्ता की पहल पर ईरानी पक्ष और उसके हकूक को लेकर संदेह ज़्यादा है.
दोनों देशों के बीच अस्थायी युद्धविराम
अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में संभावित वार्ता के लिए पहुंचे हैं, लेकिन बातचीत शुरू होने से पहले ही संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ है. कई रिपोर्टों में कहा गया है कि दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद और क्षेत्रीय तनाव के कारण यह वार्ता किसी भी समय अटक सकती है. ग़ौरतलब है कि करीब छह सप्ताह तक चले संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम लागू हुआ है. इसी के बाद पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया और इस्लामाबाद को वार्ता स्थल के तौर पर प्रस्तावित किया. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह भूमिका पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है.
पाक के कूटनीतिक कदम पर सवाल
दरअसल, पाकिस्तान का यह कूटनीतिक कदम कई कारणों से सवालों के घेरे में है. अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने इसे “अनलाइकली मेडिएटर” यानी अप्रत्याशित मध्यस्थ बताया है. कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति, क्षेत्रीय राजनीति और खाड़ी देशों के साथ उसके समीकरण इस प्रक्रिया को जटिल बना रहे हैं. क्योंकि, एक तरफ़ पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है और दूसरी तरफ़ सऊदी अरब में अपने सैन्य जत्थे की तैनाती कर रहा है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग की संधि और ईरान लगातार सऊदी के साथ टकराव मोल ले रहा है. इसके अलावा अमेरिका के लिए पाकिस्तान एक इंस्ट्रूमेंट की तरह भी है, जो इस पूरी बातचीत में फ़िट किया गाय है.
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
मध्य-पूर्व मामलों के जानकार शहनवाज़ मलिक का कहना है कि समस्या सिर्फ वार्ता स्थल की नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास की है. ईरान ने पहले ही संकेत दिया है कि वह अमेरिकी प्रस्तावों को लेकर बेहद सतर्क है. वहीं अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने पर सहमत हो. लेकिन, दोनों देशों की शर्तें एक दूसरे को कॉन्ट्राडिक्ट करती नज़र आ रही हैं. ऐसे में आशंका इस बात की है कि कहीं दबाव बनाकर ईरान को टेबल पर न हरा दिया जाए. ईरान के भी वार्ताकार इस बात को भलीभांति समझ रहे हैं कि कहीं शत्रु उन्हें इस तरह न पोट्रे कर दें, कि वो अपने ही देश के लोगों की आँखों में गुनहगार बन जाएं. लिहाज़ा, ईरान के वार्ताकार किसी भी सूरत में आउट ऑफ द लाइन नहीं जाने वाले.
पाकिस्तान की छवि पर लगता है बट्टा!
एक और जटिलता मध्य-पूर्व के मौजूदा हालात हैं. लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव ने इस वार्ता की सफलता को और अनिश्चित बना दिया है. ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक है, इसलिए यहां की स्थिति सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है. इसी बीच पाकिस्तान के लिए भी यह वार्ता एक बड़ा कूटनीतिक दांव मानी जा रही है. अगर बातचीत सफल होती है तो इस्लामाबाद खुद को वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर सकता है. लेकिन अगर वार्ता विफल होती है तो इससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को झटका भी लग सकता है.
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वार्ता पर दुनियाभर नजर
कई विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस वार्ता के जरिए वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को मजबूत करना चाहता है. लेकिन कुछ विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि इस्लामाबाद शायद अपनी कूटनीतिक क्षमता से “काफी बड़ा दांव” खेल रहा है. दूसरी ओर भारत में भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखी जा रही है. नई दिल्ली में इस बात को लेकर असहजता है कि पाकिस्तान अचानक इस संवेदनशील वैश्विक संकट में एक प्रमुख मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है. फिलहाल इस्लामाबाद में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं और पूरी दुनिया इस संभावित बैठक के नतीजे का इंतजार कर रही है.